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न्यूज क्लिपिंग्स् | आस्तियां कैसे बनीं अस्थियां!-- अनिल रघुराज

आस्तियां कैसे बनीं अस्थियां!-- अनिल रघुराज

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published Published on Feb 27, 2017   modified Modified on Feb 27, 2017
हम ऋण लेते हैं, तो वह हमारे लिए बोझ या देनदारी होता है. मशहूर कहावत भी है कि अगर हमें बैंक को 100 रुपये लौटाने हैं, तो यह हमारी समस्या है, लेकिन हमें अगर 100 करोड़ लौटाने हैं, तो यह बैंक की समस्या है. 
 

दरअसल, बैंक जब ऋण देता है, तब वह उसके लिए आस्ति होती है, क्योंकि मूलधन समेत उस पर मिला ब्याज ही उसकी कमाई का मुख्य जरिया है. इन ऋणों की वापसी अटक जाये, तो वे बैंकों के लिए अनर्जक आस्तियां या एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स) बन जाते हैं. आज हमारे बैंक, खासकर सरकारी क्षेत्र के बैंक इसी एनपीए के विशाल बोझ तले दबे पड़े हैं और हाल-फिलहाल उनके उबरने की कोई स्पष्ट सूरत नहीं दिख रही.
 

हमारे बैकिंग क्षेत्र में पांच साल पहले वित्त वर्ष 2011-12 से इस समस्या ने सिर उठाना शुरू किया. तभी से इस पर हल्ला मचाया जा रहा है. फिर भी समस्या विकराल से विकरालतर होती गयी है. इसमें भी निजी क्षेत्र के बैंक के बिजनेस मॉडल में इतना लचीलापन है कि विषम परिस्थिति के बावजूद उन्होंने अपने धंधे को संभाले रखा. असली समस्या सरकारी क्षेत्र के बैंकों की है. उनकी सेहत लगातार बिगड़ती जा रही हैं. दिसंबर 2012 में उनका सकल एनपीए 1,57,784 करोड़ रुपये था, जो अब तक करीब चार गुना हो चुका है. बता दें कि एनपीए बैंकों द्वारा दिये गये ऐसे ऋण हैं, जिनके मूलधन व ब्याज की किश्त तय तारीख से 90 दिनों बाद भी न दी गयी हो.

 


सरकारी बैंकों का एनपीए दिसंबर 2013 तक 38.53 प्रतिशत बढ़ कर 2,18,579 करोड़ रुपये और उसके साल भर बाद दिसंबर 2014 तक 19.79 प्रतिशत बढ़ कर 2,61,843 करोड़ रुपये हो गया.

 

 


इस बीच केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नयी सरकार आ चुकी थी. उम्मीद थी कि अब इस पर अंकुश लगेगा. लेकिन, दिसंबर 2014 से दिसंबर 2016 के बीच के दो सालों में सरकारी बैंकों का एनपीए 134.82 प्रतिशत बढ़ कर 6,14,872 करोड़ रुपये का हो चुका है. दिसंबर 2015 से दिसंबर 2016 के बीच ही यह 56.44 प्रतिशत बढ़ा है. अगर बैंकों द्वारा दिये गये कुल ऋण में सकल एनपीए के अनुपात की बात करें, तो दिसंबर 2012 में यह 3.87 प्रतिशत था, जबकि सितंबर 2016 तक 11.8 प्रतिशत हो चुका है.

 

 


बैंकों की नियामक संस्था भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी ताजा वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में आगाह किया है कि मौजूदा रुझान को देखते हुए सरकारी बैंकों के कुल ऋण में सकल एनपीए का अनुपात सितंबर 2016 के 11.8 प्रतिशत से बढ़ कर मार्च 2017 तक 12.5 प्रतिशत और मार्च 2018 तक 12.9 प्रतिशत हो सकता है. रिजर्व बैंक ने पिछले गवर्नर रघुरान राजन के कार्यकाल में ही नियम बना दिया था कि मार्च 2017 तक बैंकों को अपने सारे फंसे हुए ऋणों की जानकारी पूरी पारदर्शिता से दे देनी होगी और वित्त वर्ष 2016-17 की उनकी बैंलेंस शीट के आंकड़े एकदम साथ-सुथरे होने चाहिए. जानकारों के मुताबिक, बैंकों में इस समय इसके पालन के बजाय खूब लीपापोती चल रही है.

 

 


जून 2009 से मार्च 2014 तक रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर रह चुके के सी चक्रबर्ती का कहना है कि देश में एनपीए की सही-सही स्थिति साफ नहीं हैं. बैंक अपनी बैलेंस शीट को साफ करने के लिए टेक्निकल राइट-ऑफ का सहारा ले रहे हैं. कहते हैं कि इन ऋणों का वसूली बाद में कर ली जायेेगी, लेकिन वास्तव में इन्हें पूरी तरह बट्टे खाते में डाल दिया जाता है. अगर पिछले कुछ सालों में बट्टेखाते में डाले गये ऋणों को शामिल कर लिया जाये, तो हमारे बैंकों को एनपीए दस लाख करोड़ रुपये के पार चला जायेगा. तुलना के लिए बता दें कि नये वित्त वर्ष 2017-18 का कुल अनुमानित बजट 21.47 लाख करोड़ रुपये का है.

 

 


आखिर देश के सालाना बजट का लगभग आधा हिस्सा पांच सालों के भीतर ही सरकारी बैंकों का एनपीए कैसे बन गया? आखिर बैंकों की आस्तियां इस दौरान उनकी अस्थियां कैसे बन गयीं?

 

 


भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यन का कहना है, 'यह बेहद कठिन समस्या है, जिसे कम नहीं आंका जाना चाहिए. दुनिया में कहीं भी निजी क्षेत्र के ऋणों को माफ नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह नैतिक रूप से अमान्य होगा. ऐसा करना दलाल पूंजीवाद को बगैर किसी जवाबदेही के मदद करने जैसा होगा.' उनका मानना है कि इस समस्या की गंभीरता को समझने में देर की गयी और सालों-साल तक हम स्वांग करते रहे कि यह यूं ही सुलझ जायेगी.

 

 


वैसे, आम भारतीय की नजर से देखें, तो हमारी पूरी बैंकिंग व्यवस्था की नैतिक संरचना में जबरदस्त झोल है. बैंक आमजन की बचत जुटा कर उद्योगों को उपलब्ध कराते हैं. इसमें कुछ गलत भी नहीं है, क्योंकि औद्योगिक व उत्पादक गतिविधियों में बचत के लगने से रोजगार से लेकर समृद्धि व विकास के अवसर बनते हैं. देश बढ़ता है, देशवासी खुशहाल होते हैं. लेकिन, बैंकिंग व्यवस्था की विसंगति देखिये कि जब कोई आम आदमी बैंक ऋण नहीं लौटा पाता, तो उसे डिफॉल्टर घोषित कर दिया जाता है और वसूली के लिए उसकी सारी संपत्ति जब्त कर ली जाती है. किसानों से तो उनके जानवर तक छीन लिये जाते हैं.


वहीं, जब कोई अमीर या कॉरपोरेट कंपनियां बैंकों का करोड़ों का ऋण नहीं चुकातीं, तो उसे एनपीए या अनर्जक आस्ति में डाल कर छोड़ दिया जाता है. आज हमारे यहां अगर एनपीए का पहाड़ खड़ा हो गया है, तो इसकी एक बड़ी वजह यह है कि उसे पैदा करनेवाले तमाम औद्योगिक समूहों को किसी न किसी रूप में राजनीतिक प्रश्रय मिला हुआ है.

 

 


विचित्र बात यह है कि जिन कंपनियों के ऊपर सरकारी बैंकों का सबसे ज्यादा ऋण बकाया है, वे बिजली, सड़क, टेलिकॉम या स्टील जैसे उस इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र से संबंधित हैं, जिनको हमारी सरकारों ने विकास का आधार बना रखा है.

 

 


अगर ये कंपनियां इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए ऋण लेकर फंस गयी हैं और अपने साथ बैंकों को भी डुबो रही हैं, तो मतलब साफ है कि तमाम नारों और शोरगुल के बावजूद सरकारी विकास किसी संकरी गली में अटक गया है. आपको जान कर आश्चर्य होगा कि सरकारी बैंकों ने पिछले तीन सालों में 7.32 लाख करोड़ रुपये का ऋण केवल दस कंपनियों को उपलब्ध कराया है. दस की इस लिस्ट में बदनाम विजय माल्या का नाम सबसे नीचे है.

 


http://www.prabhatkhabar.com/news/columns/story/948330.html


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