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न्यूज क्लिपिंग्स् | कभी किसान के मन की बात भी करें मोदी- योगेन्द्र यादव

कभी किसान के मन की बात भी करें मोदी- योगेन्द्र यादव

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published Published on Jun 28, 2018   modified Modified on Jun 28, 2018
प्रधानमंत्री को आजकल किसानों की बड़ी चिंता है। यानी उनके वोट की बहुत चिंता है। होनी भी चाहिए। लोकसभा चुनाव का मौसम शुरू हो गया है। चाहे गुजरात से लेकर कैराना तक के चुनाव परिणाम हों या किसानों द्वारा अपनी फसल फेंक देने की खबरें हों या फिर नवीनतम जनमत सर्वेक्षण, सभी दिशाओं से किसान की नाराज़गी के संकेत आ रहे हैं। प्रधानमंत्री जानते हैं कि देश की खेती पर निर्भर आधी आबादी यह सवाल पूछ रही है: किसानों के लिए मोदी सरकार ने क्या किया? इस सवाल के उत्तर से तय होगा कि अगले साल कौन बनेगा प्रधानमंत्री।


इसलिए आजकल प्रधानमंत्री अपने भाषणों में कृषि पर बहुत बोलते हैं। पहले उन्होंने रेडियो पर किसान के नाम अपने ‘मन की बात' कही। फिर वीडियो पर कुछ चुने हुए सरकारी कृपापात्र किसानों को बैठाकर उनके मुंह से अपने ही मन की बात कहलवाई। मैं सोचने लगा: क्या कभी प्रधानमंत्री साक्षात किसान के सामने बैठकर किसान के मन की बात भी सुनेंगे? सोचते-सोचते मेरा मन मोदी और किसान के बीच एक खरी-खरी बातचीत की कल्पना करने लगा। मोदीजी खाट पर बैठे हैं। सामने कुछ किसान बैठे हैं, कुछ बुजुर्ग तो कुछ नौजवान और एक किसान कार्यकर्ता भी। बातचीत की शुरुआत मोदी जी किसानों की आय दोगुनी करने के अभियान से करते हैं। एक किसान पलटकर पूछता है: आय दोगुनी करने की मियाद 2022 क्यों है? ये बताओ कि अब तक कितना बढ़ाया? और कितना बढ़ाओगे? नौजवान कार्यकर्ता अपने फोन पर आंकड़े पढ़ने लगता है। सरकार की अपनी समिति बताती है कि छह साल में आमदनी दोगुनी करने के लिए हर साल किसान की आय 10.4% की चक्रवर्ती दर से बढ़नी चाहिए। सरकार के अपने अर्थशास्त्री मानते हैं कि पिछले चार साल में किसान की आय सिर्फ 0.44% की सालाना दर से बढ़ी है! यानी किसान की आय जो पिछले चार साल में 100 रुपए से बढ़कर 148 रुपए हो जानी चाहिए थी, वो अभी 102 रुपए भी नहीं पहुंची है।


मोदीजी मुस्कुराए: इतना तो मानो कि मेरी सरकार ने किसान को फसल का ड्योढ़ा दाम दिलाने का ऐतिहासिक फैसला लिया! किसान पूछता है: पहले तो बताइए कि आपकी सरकार फरवरी 2015 में सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा देकर इस वादे से मुकर क्यों गई थी? फिर जब 2018 बजट में इस वादे को पूरा करने की घोषणा की, तो उसमें भी डंडी क्यों मार दी? यानी संपूर्ण लागत (सी2) पर ड्योढ़ा दाम देने की बजाय आंशिक लागत (ए2+एफएल) पर ड्योढ़े दाम वाली एमएसपी की घोषणा क्यों की? एक किसान बोला: ये सब छोड़ो, हमें तो वो अधूरा दाम भी नहीं मिला, जिसकी घोषणा अरुण जेटली ने की थी। आज भी पंजाब का किसान मक्का को 1,425 रुपए के सरकारी एमएसपी रेट की बजाय 600-800 रुपए में बेच रहा है। चने की फसल सरकारी वादे से एक हज़ार रुपए प्रति क्विंटल कम पर बिकी है। सरसों में किसान को 600 रुपए क्विंटल का घाटा हुआ है। जौ की फसल सरकारी रेट से 300 रुपए सस्ती बिकी पर सरकार ने खरीदी से साफ इनकार कर दिया। आप भी अखबार देखते होंगे: किसान टमाटर सड़क पर फेंक रहे हैं, लहसुन की फसल पैदा करने वाले किसान बर्बाद हो चुके हैं। देश की एक भी मंडी का नाम बता दो जहां सभी किसानों को अपनी पूरी फसल पर सरकारी एमएसपी रेट भी मिला हो! मोदीजी ने चैलेंज स्वीकार नहीं किया। वो जानते थे कि यह सच्चाई एगमार्कनेट की सरकारी वेबसाइट में दर्ज़ है।


लेकिन मोदीजी हार मानने वाले कहां! उन्होंने पैतरा बदला और बात का रुख प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की ओर किया। युवा कार्यकर्ता ने फिर स्मार्ट फोन निकाला और बोलना शुरू किया: इस नई बीमा योजना के आने के बाद से सरकार का खर्च चार गुना बढ़ गया। पहले साल में ही प्राइवेट बीमा कंपनियों को दस हज़ार करोड़ से ज्यादा का मुनाफा हुआ। लेकिन इस बीमे के तहत आने वाले किसानों की संख्या 23% से बढ़कर सिर्फ 24% पर पंहुची। दूसरे नौजवान ने अब मुंह खोला: आपने दुनिया में कोई बीमा सुना है, जिसमें किसी का बिना पूछे, बिना बताए बीमा कर दिया जाए? किसान के साथ ही ऐसा क्यों? प्रधानमंत्रीजी ये किसान का बीमा नहीं है, ये तो बैंकों ने अपने लोन का बीमा करवाया है!


अब मोदीजी किसानों का मूड भांपने लगे थे। पहले सोचा था कि नीम कोटेड यूरिया और सॉइल हेल्थ कार्ड की बात करेंगे। लेकिन जमीनी हकीकत देखने के बाद समझ में आने लगा था कि इससे और किरकिरी होगी। इसलिए बैकफुट पर जाकर खेलने का फैसला किया: देखिये, हमारी नीयत तो साफ़ है। पिछली सरकार के मुकाबले हमने कृषि का बजट दोगुना कर दिया। लेकिन वो फोन वाला लड़का इस शॉट के लिए भी तैयार था: सरजी, इतनी बड़ी कुर्सी पर बैठकर अर्धसत्य बोलना आपको शोभा नहीं देता। कृषि बजट का एक बड़ा हिस्सा (फसल लोन के ब्याज के लिए अनुदान) पहले वित्त मंत्रालय की जेब से जाता था, आपने उसे कृषि मंत्रालय के खाते में डाल दिया। असली फर्क सिर्फ इतना है कि पिछली सरकार ने बजट के 100 रुपए में दो कृषि को दिए तो आपने दो रुपया 40 पैसे दिए। चुनावी साल में बजट बढ़ा है, लेकिन न तो दोगुना और न ही पर्याप्त।


एक किसान अब तक चुप बैठा था, लेकिन नीयत की बात सुनकर उससे रहा न गया: नीयत तो आपकी उस दिन पता लग गई थी जब आपने आते ही एमएसपी का बोनस बंद करवा दिया, जब बार-बार हमारी जमीन छीनने वाला कानून बनाने की कोशिश की थी। दूसरा बोला: अगर नीयत साफ होती तो जब विदेश से तेल सस्ता मिलना शुरू हुआ तो किसान का डीज़ल भी सस्ता न कर देते? स्मार्ट फोन फिर आंकड़े लेकर खड़ा था: मई 2014 में कच्चे तेल की खरीद 107 डॉलर प्रति बैरल थी तो डीज़ल का दाम 55 रुपए था। अब कच्चा तेल घटकर 75 डॉलर का चल रहा है लेकिन, डीज़ल का दाम बढ़कर 68 रुपए लीटर क्यों है? कार्यकर्ता बोला: साफ नीयत तो उस दिन समझ आएगी जब आप किसान को फसल के दाम की गारंटी और कर्जमुक्ति का कानून बनाओगे।


बातचीत को समेटते हुए बुजुर्ग बोले: बेशक, एक स्वस्थ किसान को मरीज बनाने का दोष कांग्रेस सरकारों का है। लेकिन, आपने तो उस मरीज को आईसीयू तक पहुंचा दिया। अगर आज भी किसान को बचाना चाहते हो तो संसद का विशेष अधिवेशन बुलाकर कम से कम ये दो कानून तो बना दो। इस बातचीत से उठते हुए मोदीजी सोच रहे थे: मैंने किसान के मन की बात पहले क्यों नहीं सुनी!


https://www.bhaskar.com/news/yogendra-yadav-analysis-under-bhaskar-mahabharat-2019-5904064.html


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