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न्यूज क्लिपिंग्स् | किताबों से दूर जाती पीढ़ी-- हरिवंश चतुर्वेदी

किताबों से दूर जाती पीढ़ी-- हरिवंश चतुर्वेदी

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published Published on Jan 15, 2018   modified Modified on Jan 15, 2018
वसंत पंचमी और सरस्वती पूजा नजदीक है, जिस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा के साथ पुस्तकों व कलम की भी पूजा होती है। नए वर्ष के आगमन के साथ पुस्तक मेलों का सिलसिला भी शुरू हो गया है। दिल्ली में विश्व पुस्तक मेले का समापन हो चुका है। अगले दो-तीन महीनों में कोलकाता, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, पटना और भुवनेश्वर जैसे महानगरों में होने वाले पुस्तक मेलों में भीड़-भाड़ दिखाई देगी। पुस्तक मेलों के साथ-साथ अब एक और मेला बहुत लोकप्रिय हो रहा है, वह है ‘लिटरेचर फेस्टिवल'। कुछ दिन बाद होने वाले जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में देश-विदेश के मशहूर लेखक और हजारों लोग भाग लेंगे। इसकी लोकप्रियता को देखकर अब लिटरेचर फेस्टिवल सभी प्रमुख महानगरों में होने लगे हैं, जिनमें युवा वर्ग की अच्छी-खासी भीड़ देखी जाती है। इस भीड़ को देखकर आपको लगेगा कि भारतीय युवाओं पर अब किताबों और साहित्य के प्रति दीवानगी बढ़ रही है। मगर किताबों और साहित्य के लिए युवाओं में बढ़ता यह रुझान क्या महानगरों के उच्च मध्यवर्गीय अंग्रेजी जानने वाले युवाओं तक ही सीमित है? या फिर भारतीय भाषाओं में किताबें पढ़ने वाले युवाओं में भी फैल पाया है?


भारतीय युवाओं में किताबें पढ़ने की आदत घट रही है या बढ़ रही है, इससे पहले यह जानना जरूरी है कि युवा फुरसत के समय में क्या करते हैं? भारत में 13 से 35 वर्ष की आयु के युवाओं की आबादी करीब 47 करोड़ है, जिसमें 34 करोड़ साक्षर हैं। बेरोजगारी के कारण इनमें से ज्यादातर युवा ‘टाइमपास' करने में लगे पाए जाते हैं। कुछ लोग गांव, कस्बों और शहरों की खाली पड़ी हुई जगहों में क्रिकेट, फुटबॉल या कबड्डी खेलते हुए दिखेंगे। एक बड़ा वर्ग मोबाइल पर बातचीत करते हुए भी दिखेगा। चाय और पान की दुकानों पर अक्सर युवाओं के झुंड मिलेंगे, जो गप्पबाजी में व्यस्त होते हैं। बहुत कम ऐसे नौजवान मिलेंगे, जिनके हाथ में कोई किताब, पत्रिका या अखबार हो, और वे उसे पढ़ रहे हों।


पिछले 25 वर्षों में हमारे देश में जो तेज आर्थिक बदलाव आए हैं, उसने हमारी समूची सामाचिक संरचना व सांस्कृतिक परिदृश्य को बदल दिया है। छोटे-बड़े शहरों में मॉल-संस्कृति का विस्तार हुआ है। मल्टीप्लेक्स और रेस्टोरेंट तो बढ़ते गए, किंतु सार्वजनिक पुस्तकालय कम होते चले गए। किताबें बेचने वाली दुकानें और बाजार बंद होते देखे गए, पर संपन्न वर्ग की पसंदीदा अंग्रेजी किताबों के प्रकाशन व्यवसाय में तेजी आई है। समाज के इस संक्रमण काल में चिंता का एक बड़ा विषय है- युवाओं में पुस्तक पढ़ने की आदत का लगातार कम होते जाना। आज अंग्रेजी में मध्यवर्गीय पाठकों के पसंदीदा विषयों पर लिखने वाले चेतन भगत जैसे लेखकों की किताबों की लाखों प्रतियां बिक जाती हैं, पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में बड़े लेखकों के उपन्यास या कहानी संग्रह हजार-दो हजार ही छपते हैं।


इसके लिए हमें यह जानना होगा कि युवाओं में किस तरह की किताबें अधिक लोकप्रिय होती हैं और वे हफ्ते में या दिन में कितनी देर किताबें पढ़ते हैं? किन विषयों पर लिखी गई किताबें उन्हें रुचिकर लगती हैं? उन्हें किताबें पढ़ने के लिए कौन लोग प्रेरित करते हैं? इन मुद्दों पर भारत में ज्यादा अध्ययन नहीं हुआ है, इसलिए आंकड़े बहुत कम उपलब्ध हैं। नेशनल बुक ट्रस्ट ने नेशनल यूथ रीडरशिप सर्वे का काम वर्ष 2009 में एनसीएईआर को सौंपा था। इस सर्वेक्षण को देश के 207 जिलों के 432 गांवों और 199 शहरों के 753 नगरीय वार्डों में संचालित किया गया था और 38,575 युवाओं के इंटरव्यू लिए गए।


इस सर्वे में साक्षर युवाओं में सिर्फ 25 प्रतिशत किताब पढ़ने के शौकीन पाए गए। भौगोलिक और धार्मिक आधार पर भी पढ़ने की आदत में काफी फर्क पाया गया। साक्षर युवाओं में दक्षिण भारत के 24 प्रतिशत, पश्चिम व पूर्व भारत के 22 प्रतिशत, मध्य भारत के 12 प्रतिशत और उत्तर भारत के सिर्फ 13 प्रतिशत युवा किताबें पढ़ने का शौक रखते थे।


जिन युवाओं में पुस्तक पढ़ने का शौक है, वे आखिर क्या पढ़ते हैं? 42 प्रतिशत हास्य-व्यंग्य और साहित्यिक रचनाएं पढ़ने के शौकीन हैं। पुस्तक प्रेमियों को यह शौक ज्यादातर अपने स्कूलों, अभिभावकों या शिक्षकों से मिला। सिर्फ 12 प्रतिशत साक्षर युवा उपहार लेने या देने के लिए किताबों का उपयोग करते हैं। भारतीय युवाओं में पुस्तकों से विरक्ति या अरुचि क्यों है? सर्वे में पाया गया कि अरुचि के चार खास कारण हैं- ‘पढ़ने में दिलचस्पी न होना, समय न होना, सूचना के नए स्रोत मिलना और वाजिब कीमत पर किताबें उपलब्ध न होना।' नौजवानों में किताबें पढ़ने के शौक के कम होने के पीछे एक प्रमुख कारण देश में सार्वजनिक पुस्तकालयों की मौजूदा खस्ता हालत भी है। आजादी के बाद जिला, तहसील, तालुका और गांव के स्तर पर सार्वजनिक पुस्तकालय स्थापित हुए थे, जो स्थानीय स्तर पर बौद्धिकता, रचनात्मक लेखन, सांस्कृतिक पुनर्जागरण व युवा-पीढ़ी के निर्माण का केंद्र बनते देखे गए। आज अधिकांश पुस्तकालयों की इमारतें जर्जर हो चुकी हैं, किताबें बहुत पुरानी और अपठनीय हैं और लाइब्रेरी स्टाफ को गुजारे लायक वेतन मिल पाता है।


युवा पीढ़ी के लोग यह तर्क रख सकते हैं कि उनके पास स्मार्टफोन और कंप्यूटर हैं और वे इंटरनेट व गूगल सर्च का इस्तेमाल करके कोई भी सूचना प्राप्त कर सकते हैं। किसी सीमा तक उनके तर्क में दम है, पर दुनिया ने अभी तक इंटरनेट और गूगल सर्च को किताबों के विकल्प के रूप में पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया है। सबसे अहम सवाल यही है कि युवा पीढ़ी को किताबें पढ़ने के लिए कैसे प्रेरित किया जा सकता है? इस सवाल का हल ढूंढ़ने के लिए सरकारों, स्कूलों और परिवारों को अपनी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी। स्कूलों में लाइब्रेरी और किताबें तो हैं, किंतु उन्हें पढ़ने की आदत को विकसित करने पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अभिभावक भी प्रतियोगी परीक्षाओं और कोचिंग पर ज्यादा ध्यान देते हैं। वे अपने बच्चों को महंगे स्मार्टफोन तो खरीदकर दे सकते हैं, किंतु उनके लिए किताबें खरीदकर लाना उनकी आदतों में शुमार नहीं होता।


युवा पीढ़ी में किताबों को पढ़ने की आदत को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका केंद्र व राज्य सरकारें निभाती हैं। इसमें ज्यादातर सरकारें असफल रही हैं। अपवाद के रूप में महाराष्ट्र और तमिलनाडु की राज्य सरकारों का नाम लिया जा सकता है, जिन्होंने कानून बनाकर जिला, तहसील और तालुका स्तर पर पब्लिक लाइब्रेरी संचालित करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली। नतीजतन, शिक्षा के क्षेत्र में इन दो राज्यों की उपलब्धियां राष्ट्रीय औसत से कहीं ऊपर रही हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)


https://www.livehindustan.com/blog/story-harivansh-chaturvedi-article-in-hindustan-on-15-january-1748998.html


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