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न्यूज क्लिपिंग्स् | जिका वायरस के आसन्न खतरों को लेकर दुनियाभर में बढ़ी चिंता

जिका वायरस के आसन्न खतरों को लेकर दुनियाभर में बढ़ी चिंता

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published Published on Feb 1, 2016   modified Modified on Feb 1, 2016
इबोला और स्वाइन फ्लू जैसी महामारी से हाल में निबटने और किसी भी समय इनके दोबारा उभरने की आशंकाओं के बीच दुनिया में एक नयी महामारी का खतरा मंडरा रहा है. मच्छरजनित ‘जिका वायरस' एक नयी वैश्विक चुनौती बन कर उभर रहा है. वैश्विक स्वास्थ्य के लिहाज से इसे लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है. 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' के मुताबिक, मई, 2015 में ब्राजील में जिका वायरस का पहला मामला सामने आया. उसके बाद से अब तक यह बीमारी करीब 23 और देशों तक पहुंच चुकी है. ब्राजील में हालात सबसे खराब हैं. आशंका है कि यहां हजारों लोग इस वायरस से संक्रमित हो सकते हैं. अक्तूबर से अब तक यहां इसके 4,120 संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं. इनमें से 270 मामलों की लैब टेस्ट में पुष्टि हो चुकी है.

'विश्व स्वास्थ्य संगठन' के डायरेक्टर जनरल मार्गरेट चान का कहना है कि जिका वायरस की निगरानी के लिए इंटरनेशनल हेल्थ रेगुलेशन इमरजेंसी कमेटी का गठन किया जा रहा है. साथ ही इसके असर से होने वाली मस्तिष्क संबंधी बीमारियों और नवजात शिशुओं में होनेवाली विरूपताओं पर नजर रखी जायेगी. यह कमेटी इसके व्यापक असर का मूल्यांकन करेगी.

अमेरिका में भी दर्जनों मामलों की पुष्टि

अमेरिकी स्वास्थ्य विभाग के हवाले से 'द गार्डियन' में बताया गया है कि अब तक उन 31 अमेरिकी नागरिकों में जिका वायरस का संक्रमण पाया गया है, जिन्होंने इस वायरस से प्रभावित इलाकों की यात्रा की थी. लेकिन, अमेरिका में मच्छरों से इसके फैलने का कोई मामला नहीं पाया गया है. जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के पब्लिक हेल्थ लॉ एक्सपर्ट लॉरेंस गोस्टिन ने इसे वैश्विक चुनौती करार दिया है और इसके भयावह दुष्परिणाम की आशंका जतायी है. हालांकि इस चुनौती से निबटने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन की तैयारियों की उन्होंने आलोचना की है. उनका कहना है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इबाेला के उभरने के दौरान भी ज्यादा चुस्ती नहीं दिखायी थी.

क्या है जिका वायरस

जिका मच्छरों से पैदा होेनेवाला एक वायरस है. वर्ष 1947 में अफ्रीकी देश युगांडा में बंदरों की एक खास प्रजाति में सिल्वेटिक येलो फीवर की मॉनीटरिंग के दौरान पहली बार इस वायरस की पहचान की गयी थी. उसके बाद 1952 में युगांडा और तंजानिया में पहली बार इनसानों में इसकी पहचान की गयी. उसके बाद से अफ्रीका, अमेरिका, एशिया और पेसिफिक क्षेत्र में इस बीमारी के मामले कई बार सामने आ चुके हैं.

ब्राजील में हालिया जिका वायरस संक्रमण के कारण स्थानीय स्वास्थ्य प्राधिकरणों ने आम लोगों को इस खतरे के खिलाफ आगाह किया है. साथ ही वे ब्राजील में पैदा होनेवाले बच्चों में माइक्रोसेफेली पर नजर रखे हुए हैं. स्वास्थ्य व अन्य संबंधित एजेंसियां माइक्रोसेफेली और जिका वायरस के बीच किसी आपसी संबंध की जांच के लिए सबूत तलाश रही हैं. फिलहाल माइक्रोसेफेली और जिका वायरस के बीच आपसी संबंध होने की आशंकाएं जतायी जा रही हैं, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि इस बारे में अभी पुख्ता तौर पर नहीं कहा जा सकता. इसके लिए और ज्यादा शोध की जरूरत है.

क्या है माइक्रोसेफेली

माइक्रोसेफेली एक ऐसी विकृत अवस्था है, जिसके तहत पैदा होनेवाले नवजात का सिर असामान्य रूप से छोटा होता है. ऐसा भ्रूण या गर्भ में बच्चे के दिमाग के असामान्य विकास के कारण होता है. 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के मुताबिक, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ एंड ह्यूमैन डेवलपमेंट के साइंटिफिक डायरेक्टर डॉ कॉन्सटेंटिन स्ट्राटाकीज का कहना है कि छोटे सिर वाले नवजातों में आमतौर पर करीब 15 फीसदी मामले सामान्य होते हैं और आगे चल कर उन्हें किसी तरह का नुकसान नहीं होता है. लेकिन अन्य मामलों में नवजात का सिर पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाता है.

माइक्रोसेफेली से पीड़ित बच्चों को आगे चल कर अनेक प्रकार की दिमागी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जैसे- विकास की बाधाएं, बुद्धिमत्ता का अभाव या कम सुनाई देना आदि. यह दुष्परिणाम प्रत्येक पीड़ित बच्चे में अलग-अलग किस्म का हो सकता है. कई बार गर्भवती महिला द्वारा अलकोहल का सेवन करने, कुपोषण या डायबेटिक होने पर भी नवजात में माइक्रोसेफेली हो जाती है. यदि यह विकृति बच्चे के जन्म के पहले साल में होती है, तो इसका कारण डिलीवरी के दौरान ब्रेन इंज्यूरी भी हो सकता है. आम तौर पर इस बीमारी का इलाज नहीं है. हालांकि, माइक्रोसेफेली के लिए अनेक पर्यावरणीय और जेनेटिक कारक भी जिम्मेवार माने जाते हैं- जैसे डाउन्स सिंड्रोम, किसी खास दवा से रिएक्शन होना, भ्रूण में अलकोहल या अन्य टॉक्सिन्स का होना और गर्भावस्था के दौरान रूबेला वायरस का संक्रमण होना.

वायरस का ट्रांसमिशन

आम तौर पर यह वायरस खास प्रजाति के संक्रमित एडीस मच्छर के काटने से फैलता है. मुख्य रूप से ये मच्छर उष्णकटिबंधीय इलाकों में पाये जाते हैं. ये ठीक उसी तरह होते हैं, जैसे डेंगू, चिकनगुनिया और येलो फीवर के वाहक मच्छर. इस सदी में इस वायरस के सामने आने का पहला मामला पेसिफिक इलाके में वर्ष 2007 में दर्ज किया गया था. इसके बाद 2015 में ब्राजील और कोलंबिया के अलावा अफ्रीका के केप वार्ड इलाके में इसके मामले दर्ज किये गये.

भारत में खतरा और बचाव की तैयािरयां

भारत में खतरा इसलिए है, क्योंकि जिका वायरस एडीज मच्छर से फैलता है और भारत में इन मच्छरों की भरमार है. मलेरिया भी इन्हीं मच्छरों से होता है. इस वायरस से माइक्रोसेफेली नामक बीमारी होती है. गर्भ में पल रहे बच्चों को ज्यादा खतरा है.स्वास्थ्य मंत्रालय ने किसी भी संभावित मामले से निबटने के लिए दो समितियों का गठन किया है. मंत्रालय के मुताबिक, सामुदायिक स्तर पर कड़ी निगरानी रखी जायेगी, ताकि एडीज मच्छर से जिका वायरस का संक्रमण न फैल सके. टेक्निकल कमेटी जिका वायरस से बचाव के उपाय और इस पर एडवाइजरी जारी करने का काम करेगी, जबकि ज्वाइंट मॉनीटरिंग कमेटी इसके मामलों की समीक्षा के लिए हर सप्ताह बैठक कर हालात की समीक्षा करेगी. फिलहाल जिका वायरस पर पुणे के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में काम चल रहा है. हालांकि, भारत में अब तक इसका कोई मामला सामने नहीं आया है. लेकिन मंत्रालय का कहना है कि छह और लैब में इस वायरस पर काम शुरू कर दिया जायेगा. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने जिका प्रभावित देशों में नहीं जाने की सलाह दी है. यह वायरस गर्भ में पल रहे बच्चे को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है, इसलिए गर्भवती महिलाओं को खास तौर पर सतर्कता बरतने को कहा गया है. जो महिलाएं इन देशों की यात्रा कर चुकी हैं, वे दो सप्ताह के भीतर वायरस की जांच करा लें.

 

चिंता बढ़ने के प्रमुख कारण

'विश्व स्वास्थ्य संगठन' के डायरेक्टर जनरल मार्गरेट चान के मुताबिक, इस वायरस से चिंता के चार प्रमुख

कारण हैं :

जन्म के समय विकृतियों से जुड़े संक्रमण और न्यूरोलॉजिकल सिंड्रोम से संभावित जुड़ाव का होना.

मच्छरों के विस्तार का व्यापक भौगोलिक दायरा होने के कारण वैश्विक स्तर पर इसके फैलने की आशंका.

नये प्रभावित इलाकों में लोगों में इसके खिलाफ इम्यूनिटी का अभाव.

बचाव के लिए किसी वैक्सिन का न होना.

 

बीमारी के लक्षण

हालांकि, जिका वायरस के इन्क्यूबेशन पीरियड यानी इसके लक्षणों के प्रकट होने के समय के बारे में स्पष्टता नहीं है, फिर भी माना जाता है कि यह समय कुछ दिनों का होता है. डेंगू और ऐसे अन्य बुखारों की तरह के लक्षण इसके आरंभिक संकेत माने जाते हैं. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक, इसके कुछ प्रमुख लक्षण और तथ्य इस प्रकार हैं :

जिका वायरस से संक्रमित प्रत्येक पांच में से एक व्यक्ति बीमार होता है.

फीवर, ज्वाइंट पेन, स्किन रेशेज, आंखों में कंजक्टिवाइटिस का होना इसके सामान्य लक्षण हैं. अन्य लक्षणों में मसल पेन और सिर दर्द हो सकते हैं.

इसका बुखार आम तौर पर सामान्य ही होता है, जिसका असर कई दिनों या एक सप्ताह तक हो सकता है.

आम तौर पर यह वायरस संक्रमित व्यक्ति के खून में अगले कई दिनों तक मौजूद हो सकता है, लेकिन कई लोगों में यह ज्यादा दिनों तक भी रह सकता है.

इस बीमारी के घातक होने पर कुछ मामलों में मरीज को अस्पताल भी ले जाने की नौबत आती है.

क्या है इलाज

मच्छरजनित अन्य बीमारियों के मुकाबले जिका वायरस से पैदा होनेवाली बीमारी अपेक्षाकृत कम घातक है और इसके लिए किसी खास इलाज की जरूरत नहीं पड़ती है. इससे पीड़ित मरीजों को भरपूर आराम के साथ पर्याप्त मात्रा में द्रव पदार्थ लेने की सलाह दी जाती है. इसके अलावा मरीज दर्द और बुखार में दी जानेवाली सामान्य दवाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं. यदि लक्षण ज्यादा घातक दिखें, तो मरीज को विशेष मेडिकल केयर की जरूरत हो सकती है.

किन देशों में खतरा?

ब्राजील, बारबाडोस, बोलिविया, केप वर्डे, कोलंबिया, डोमिनिकल रिपब्लिक, इक्वेडोर, अल सल्वाडोर, फ्रेंच गयाना, ग्वाडेलोप, ग्वाटेमाला, गयाना, हैती, होंडूरास, मार्टिनिक, मैक्सिको, पनामा, पराग्वे, प्यूर्टो रिको, सेंट मार्टिन, सूरीनाम, सामोआ, द यूएस वर्जिन आइलैंड्स और वेनेजुएला.

ओलिंपिक खेल होने हैं ब्राजील में

इस वर्ष अगस्त में ब्राजील के रियो डि जेनेरियो में ओलिंपिक खेल होनेवाले हैं. ब्राजील सरकार को डर है कि दुनियाभर से आनेवाले खिलाड़ी और दर्शक कहीं इस बीमारी की चपेट में आकर इसका वायरस दुनियाभर में न फैला दें. इसके वायरस के संक्रमण पर जल्द-से-जल्द काबू पाने की जरूरत है. ब्राजील सरकार ने मच्छरों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है. जिन स्टेडियमों में ओलिंपिक खेल होने हैं, वहां मच्छरों को पनपने से रोकने के उपाय किये जा रहे हैं.

क्या-क्या तैयारियां कर रहा अमेरिका?

अमेरिकी स्वास्थ्य विभाग की प्रमुख एजेंसी 'सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन' यानी सीडीसी ने पिछले दिनों जिका वायरस के बारे में आगाह किया था. अमेरिका में इस बीमारी के दाखिल होने की दशा में उसने इससे बचाव की तैयारी कर ली है. ज्यादातर देशों में प्रयोगशालाओं में चिकनगुनिया और डेंगू की जांच की सुविधा मौजूद है. इन प्रयोगशालाओं में जिका के परीक्षण किये जाने की तैयारी हो रही है. इंटरनेशनल पब्लिक हेल्थ पार्टनर्स के साथ सीडीसी निम्न कार्य कर रहा है :

हेल्थकेयर सुविधाएं मुहैया करानेवालों और आम लोगों को जिका वायरस के बारे में आगाह कर रहा है.

हेल्थ लेबोरेटरीज को टेस्ट की सुविधा मुहैया करायी जा रही है.

जिका की पहचान करते हुए उनके मामले दर्ज कर रहा है, जो इसे फैलने से रोकने में मददगार साबित होगा.


http://www.prabhatkhabar.com/news/special-news/story/718408.html


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