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न्यूज क्लिपिंग्स् | झटका उपचार का नया दौर- आनंद प्रधान

झटका उपचार का नया दौर- आनंद प्रधान

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published Published on Sep 19, 2012   modified Modified on Sep 19, 2012
जनसत्ता 19 सितंबर, 2012: यूपीए सरकार ने एक झटके में ताबड़तोड़ डीजल-रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी से लेकर अर्थव्यवस्था के संवेदनशील क्षेत्रों को विदेशी पूंजी के लिए खोलने और सार्वजनिक क्षेत्र की कई कंपनियों के विनिवेश जैसे कई बड़े और विवादास्पद फैसलों का एलान करके संकट में फंसी अर्थव्यवस्था पर ‘झटका उपचार’ (शॉक थेरेपी) को आजमाने की कोशिश की है। यह उपचार भारत में कोई पहली बार नहीं आजमाया जा रहा है। याद रहे, 1991 में नरसिंह राव सरकार और तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने इसी अंदाज में नव उदारवादी आर्थिक सुधारों की शुरुआत की थी। यही नहीं, भारत के अलावा और भी कई देशों में इस तरीके को आजमाया जा चुका है।

असल में, ‘झटका उपचार’ नवउदारवादी आर्थिक सैद्धांतिकी में सत्तर से लेकर नब्बे के दशक तक मुक्त बाजार और व्यापार आधारित बाजारोन्मुख आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने का सबसे कुख्यात तरीका रहा है। अमेरिकी नवउदारवादी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन को उसका प्रमुख सिद्धांतकार और रचनाकार माना जाता है। फ्रीडमैन के नेतृत्व में ही सबसे पहले, सत्तर के दशक के मध्य में, लातिन अमेरिकी देश चिली में तानाशाह जनरल पिनोशे की सरकार ने ‘झटका उपचार’ के तहत अर्थव्यवस्था के बड़े पैमाने पर निजीकरण, खुले व्यापार, विदेशी पूंजी को न्योता, सामाजिक कल्याण की योजनाओं को समेटने या उनके बजट में भारी कटौती जैसे कदम एक झटके में उठाए थे और लोगों को संभलने का मौका भी नहीं दिया था।

उल्लेखनीय है कि उससे पहले अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआइए ने चिली में वामपंथी राष्ट्रपति साल्वाडोर अलेंदे की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को जनरल पिनोशे की अगुआई में सैनिक तख्तापलट के जरिए हटाने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। यह चिली के लोगों के लिए पहला आघात था और यह किसी से छिपा नहीं है कि उसके बाद बड़े पैमाने पर राजनीतिक खासकर वामपंथी नेताओं-कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुई, बहुतों का उत्पीड़न किया गया। उसके बाद अर्थव्यवस्था के त्वरित ‘संपूर्ण रूपांतरण’ की नवउदारवादी परियोजना के तहत मिल्टन फ्रीडमैन और उनके शिकागो-स्कूल के अर्थशास्त्रियों के नेतृत्व में अर्थव्यवस्था को ‘झटका उपचार’ दिया गया, जिसका मुख्य जोर निजीकरण, मुक्त बाजार, खुले व्यापार, विदेशी पूंजी और सामाजिक कल्याण की योजनाओं को समेटने पर था।

यह सब ताबड़तोड़ अंदाज में किया गया और इसके पीछे फ्रीडमैन का तर्क  था कि अर्थव्यवस्था में अचानक, अत्यधिक तेजी और बड़े पैमाने पर किए गए बदलावों से आम लोगों में जो मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया होगी उससे उन्हें उन बदलावों के साथ सामंजस्य बैठाने में मदद मिलेगी। इसके बाद लातिन अमेरिका के अन्य देशों जैसे ब्राजील, अर्जेंटीना और उरुग्वे आदि में भी सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में अमेरिका समर्थित फौजी या तानाशाह सरकारों ने मिल्टन फ्रीडमैन और उनके शिकागो स्कूल के अर्थशास्त्रियों के नेतृत्व में ‘झटका उपचार’ के साथ नवउदारवादी आर्थिक सुधारों को जोर-जबर्दस्ती लागू किया। जल्दी ही लातिन अमेरिका ऐसे तथाकथित आर्थिक सुधारों की सबसे बड़ी प्रयोगस्थली बन गया।

खुद अमेरिका में इसी दौर में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और ब्रिटेन में प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने इन नवउदारवादी सुधारों को जोर-शोर से आगे बढ़ाया। इन सुधारों का सबसे अधिक जोर निजीकरण खासकर सार्वजनिक सेवाओं को निजी हाथों में सौंपने, सामाजिक कल्याण की योजनाओं में कटौती, अमीरों और कंपनियों के लिए करों में कटौती, विनियमन (डी-रेगुलेशन), मुक्त बाजार और व्यापार को बढ़ावा देने और ट्रेड यूनियनों को खत्म करने पर था। इन सुधारों के सिद्धांतकार मिल्टन फ्रीडमैन थे जिनकी किताब ‘पूंजीवाद और आजादी’ (कैपिटलिज्म एंड फ्रीडम) इन नवउदारवादी आर्थिक सुधारों की बाइबिल बन गई थी।

दरअसल, फ्रीडमैन की मुक्त बाजार वैचारिकी का सार यह था कि सरकारों को कंपनियों के मुनाफे की राह में आने वाले हर कानून और नियमों को खत्म कर देना चाहिए। सरकारों को कारोबार और उत्पादन से हट जाना चाहिए और हर उस सरकारी उपक्रम को निजी कंपनियों को सौंप देना चाहिए जिन्हें वे मुनाफे के साथ चला सकती हैं। सरकारों को सामाजिक कल्याण के उपायों को या तो बंद कर देना चाहिए या उनके बजट में भारी कटौती करनी चाहिए। शिक्षा और स्वास्थ्य समेत सभी सार्वजनिक सेवाओं का निजीकरण कर देना चाहिए। यही नहीं, सरकारों की भूमिका सीमित होनी चाहिए और उन्हें बाजार में हस्तक्षेप करने से परहेज करना चाहिए। उन्हें करों में कटौती करनी चाहिए। कीमतें और मजदूरी (या वेतन) बाजार के भरोसे छोड़ देनी चाहिए।

इसी दौर में लातिन अमेरिकी देशों में ‘झटका उपचार’ की कथित ‘सफलताओं’ से उत्साहित अमेरिका ने विश्व बैंक- अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष को आगे करके ‘वाशिंगटन सहमति’ के नाम पर एशिया और अफ्रीका के आर्थिक संकट में फंसे देशों में भी कर्ज के बदले इन नवउदारवादी सुधारों को शर्त की तरह थोपना शुरू किया। यही समय था जब सोवियत रूस और पूर्वी यूरोप में समाजवादी ढांचा अपने ही अंतर्विरोधों के कारण ढह रहा था और ‘पूंजीवाद और पूंजीवादी उदार लोकतंत्रों का कोई विकल्प नहीं है’ की घोषणा के साथ ‘इतिहास के अंत’ एलान किया जा रहा था। इसी दौरान रूस में राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन के नेतृत्व में रूस में समाजवादी अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करने की मुहिम में एक बार फिर ‘झटका   उपचार’ का खुल कर इस्तेमाल किया गया और उसके प्रमुख रचनाकार अमेरिकी अर्थशास्त्री जैफ्री साक्स थे जो बोलीविया में यह प्रयोग कर चुके थे।

इधर भारत में 1991 में भुगतान संतुलन के संकट से निपटने के नाम पर कांग्रेस की नरसिंह राव सरकार ने अर्थव्यवस्था को ‘झटका उपचार’ देने के लिए विश्व बैंक-मुद्राकोष की मदद से देशी डॉक्टर खोज निकाला। यह किसी से छिपा नहीं है कि कांग्रेस के राजनेता न होने के बावजूद और बिना चुनाव जीते भी डॉ मनमोहन सिंह को 1991 में वित्तमंत्री बनाया गया और उन्होंने झटके के साथ ‘वाशिंगटन सहमति’ के तहत ढांचागत समायोजन कार्यक्रम लागू करना शुरू कर दिया। इसके तहत निजीकरण, विनियमन, सबसिडी कटौती, रुपए का अवमूल्यन, विदेशी निवेश, मुक्त बाजार और खुला व्यापार की नीतियों को तेजी से आगे बढ़ाया गया। इसके बाद पिछले दो दशक में क्या हुआ, सबको पता है।

इस दौरान केंद्र या राज्यों में आने वाली सभी रंगों और झंडों की सरकारों ने आंख मूंद कर और पहले से ज्यादा उत्साह से यह तर्क  देते हुए नवउदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाया है कि इनका कोई विकल्प नहीं है। यही कारण है कि ताजा आर्थिक सुधारों के बारे में मंत्रिमंडल के फैसलों की जानकारी दे रहे वाणिज्यमंत्री आनंद शर्मा से जब पत्रकारों ने पूछा कि विपक्ष के कड़े विरोध को देखते हुए आप विदेशी कंपनियों और निवेशकों को कैसे आश्वस्त करेंगे कि सरकार बदलने की स्थिति में खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश की नीति को पलटा नहीं जाएगा, उन्होंने पलट कर सवाल दागा कि पिछले बीस वर्षों में आर्थिक सुधारों से संबंधित कौन-सा फैसला पलटा गया है? यह एक ऐसा तथ्य है जिसे नकारना मुश्किल है और जो यह बताता है कि देश में अर्थनीति, राजनीति से बहुत पहले स्वतंत्र हो चुकी है।
 
यही कारण है कि आर्थिक सुधारों की चैंपियन नरसिंह राव सरकार को लोगों ने 1995 के आम चुनावों में नकार दिया, लेकिन उसके बाद सत्ता में आई संयुक्त मोर्चा सरकार ने न सिर्फ उन्हीं नवउदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाया, बल्कि तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने कॉरपोरेट और अमीरों को खुश करने वाला ‘ड्रीम बजट’ पेश किया था। लेकिन ‘ड्रीम बजट’ के बावजूद संयुक्तमोर्चा को आम लोगों ने चुनावों में सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके बाद आई राजग सरकार ने और जोर-शोर से नवउदारवादी आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाया। वाजपेयी सरकार ने पहली बार विनिवेश मंत्रालय खोला और सरकारी कंपनियों को धड़ल्ले से बेचा गया।

इस दौरान नीति-निर्माण में कॉरपोरेट जगत की सीधी और बढ़ती भूमिका का प्रमाण थी प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद, जिसमें देश के सभी बड़े उद्योगपति मौजूद थे और वे अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में सुधारों को आगे बढ़ाने लिए ‘रोडमैप’ बनाते और लागू कराते दिखे। इन आर्थिक सुधारों के समर्थकों और गुलाबी कॉरपोरेट मीडिया ने राजग सरकार के कार्यकाल में ‘इंडिया शाइनिंग’ के दावे करते हुए इन सुधारों की कामयाबियों का खूब राग अलापा, लेकिन आम चुनावों में लोगों ने उसे जोरदार झटका दिया और सत्ता से बाहर कर दिया। इसके बावजूद ‘भारतीय जनतंत्र’ का कमाल देखिए कि इस राजनीतिक परिवर्तन का अर्थनीति पर कोई असर नहीं पड़ा।

अर्थनीति, राजनीति से स्वतंत्र बनी रही और यूपीए की नई सरकार भी इन्हीं नवउदारवादी सुधारों को आगे बढ़ाने में जुटी रही जिसके खिलाफ लोगों ने जनादेश दिया था। यहां तक कि वामपंथी पार्टियों के समर्थन पर टिके होने का भी कोई खास असर नहीं पड़ा। उलटे इन नवउदारवादी आर्थिक सुधारों की सैद्धांतिक-राजनीतिक विरोधी माकपा पर यूपीए खासकर कांग्रेस के साथ का ऐसा असर हुआ कि पश्चिम बंगाल में उसने उन्हीं नीतियों को जोर-शोर से आगे बढ़ाना शुरू कर दिया और आखिरकार उसकी राजनीतिक कीमत चुकाई।

मुख्यधारा के सभी राजनीतिक दलों और गठबंधनों में नवउदारवादी आर्थिक सुधारों को लेकर कमोबेश एक आम सहमति बन चुकी है। इसने लोकतंत्र को बेमानी बना दिया है, क्योंकि विभिन्न सरकारों और उनकी आर्थिक नीतियों और कार्यक्रमों के खिलाफ लगातार जनादेश के बावजूद आर्थिक नीतियों पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। यहां तक कि पिछले कुछ महीनों में यूरोप में गंभीर आर्थिक संकट में फंसे देशों- यूनान, इटली और स्पेन आदि- में लोगों के खुले विरोध के बावजूद जिस तरह से नवउदारवादी आर्थिक सुधारों को उनके गले उतारा जा रहा है, उससे साफ हो गया है कि पूंजीवादी उदार लोकतंत्रों की असलियत क्या है।

यह सही है कि सरकार पर आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए बड़ी देशी-विदेशी पूंजी का जबर्दस्त दबाव था। लेकिन यूपीए सरकार ने खूब सोच-समझ कर एक झटके में ताबड़तोड़ ये फैसले किए हैं। इससे उसे न सिर्फ राष्ट्रीय राजनीति का एजेंडा बदलने का मौका मिल गया है, बल्कि देशी-विदेशी बड़ी पूंजी को खुश करने के साथ फिर से उसका समर्थन और विश्वास जीतने का भी। लोगों को डराया भी जा रहा है कि ये फैसले नहीं होते तो देश गंभीर आर्थिक संकट में फंस सकता था। मोंटेक सिंह अहलूवालिया के बयान पर गौर कीजिए कि अगर ये फैसले नहीं होते तो अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां भारत की रेटिंग गिरा देतीं और उससे देश के बड़े आर्थिक संकट में फंसने का खतरा पैदा हो जाता।

झटका उपचार की इस रणनीति की एक और खास बात यह है कि यह आमतौर पर आर्थिक या राजनीतिक संकट को अवसर   की तरह इस्तेमाल करती है। भले ही वह संकट खुद उन नीतियों के कारण आया हो लेकिन उस संकट से निपटने के नाम पर नवउदारवादी आर्थिक सुधारों की और बड़ी और कड़वी खुराक को अनिवार्य बता कर लोगों के गले उतारने में इसका कोई जवाब नहीं है। एक बात और साफ है कि बिना किसी अपवाद के ‘झटका उपचार’ का सबसे अधिक झटका श्रमिकों, किसानों, अन्य गरीबों वर्गों और निम्न मध्यवर्ग को झेलना पड़ता है, जबकि उसका सबसे अधिक फायदा बड़ी पूंजी के मालिकों और अमीरों को होता है। चिली से लेकर रूस तक के उदाहरण इसकी गवाही देते हैं। यूपीए सरकार के ताजा फैसले भी इसके अपवाद नहीं हैं।

http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/20-2009-09-11-07-46-16/28781-2012-09-19-06-03-36


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