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न्यूज क्लिपिंग्स् | बिरसा का अबुआ दिसुम अबुआ राज झारखंड में कब आयेगा?

बिरसा का अबुआ दिसुम अबुआ राज झारखंड में कब आयेगा?

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published Published on Jun 9, 2015   modified Modified on Jun 9, 2015
नौ जून 1900 को रांची के जेल मोड़ स्थित कारागार में बिरसा मुंडा की मृत्यु हुई थी. नौ जून 2015 को उनकी 115 वीं पुण्यतिथि मनायी जा रही है. झारखंड में बिरसा मुंडा को भगवान की तरह पूजा जाता है. बिरसा के नेतृत्व में 1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे. बिरसा और उसके चाहनेवाले लोगों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था.

अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमान से लैस होकर खूंटी थाने पर धावा बोला. 1898 में मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं से हुई, जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी, लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं. जनवरी 1900 में डोमबारी पहाड़ी पर एक और संघर्ष हुआ था, जिसमें बहुत सी औरतें और बच्चे मारे गये थे. उस जगह बिरसा अपनी जनसभा को संबोधित कर रहे थे.

बाद में बिरसा के कुछ शिष्यों की गिरफ्तारियां भी हुईं. अंत में स्वयं बिरसा भी तीन फरवरी 1900 को चक्र धरपुर में गिरफ्तार कर लिये गये. बिरसा मुंडा ने अपनी अंतिम सांसें नौ जून 1900 को रांची कारागार में ली. आज भी झारखंड, ओड़िशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में बिरसा मुंडा को भगवान की तरह पूजा जाता है. उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता हमारा यह विशेष पेज.

गिरिधारी राम गौंझू ‘गिरिराज'

जब झारखंड में झारखंडियों का राज था तब यहां आदिम साम्यवाद स्थापित था. न आडंबर पूर्ण जीवन था, ना शोषण पूर्ण समाज था, न गैर बराबरी थी, न व्यक्तिवाद था, न निरस जीवन था. झारखंड एक कमाता, खाता, नाचता, गाता, बजाता समाज था. मेहनती ईमानदारी और नृत्य संगीत के प्रति असीम अनुराग पूर्ण जीवन था.

भूमिहीन कोई न था. जंगल और जमीन से सब कुछ उपलब्ध था. ऐसा कोई गांव न था जहां अखरा न था जहां हर रात नाचना गाना बजाना चलता न था. गरीबी और अभाव न था. जीवन मधुर और सुंदर था ऐसी इनकी शिक्षा और संस्कृति थी. गांव-घरों में ताले क्या होते हैं लोग जानते तक न थे.

ऐसे खुशहाल झारखंडी जीवन में आग लगाने आ गये अंगरेज और इनके गुलाम बनाये रखने वाले नियम कानून और शासन व्यवस्था. झारखंड के सुंदर मधुर जीवन को समाप्त करने का जो सिलसिला अंगरेजी राज के समय से चला वह बंगाल के, बिहार के और वर्तमान में झारखंड के शासन में बढ़ता ही जा रहा है. इस विकट समस्या को झारखंड के अनेक महानायकों ने दूर करने के लिए अनेक उनगुलानों का चेन बनते रहे पर वह समाप्त न हुआ.

इन्हीं महान उनगुलानी महानायकों में एक सिरमौर हुए भगवान बिरसा, महात्मा बिरसा, धरती अब्बा, बिरसा मुंडा. बिरसा के महान उलगुलान को ध्यान में रख कर उनके उलगुलान के अनुरूप झारखंड अबुआ दिसुम अबुआ राज की स्थापना इनके जन्मदिवस पर रखा गया. पर क्या बिरसा का यह सपना आज भी पूरा हो पाया है?

जमीन, जंगल, जल, जानवर पर झारखंडियों का कब्जा था. इसे अंगरेजों ने नियम कानून बना कर झारखंडियों से लूटा.

इन्हें जमीन से बेदखल किया गया, विस्थापित किया गया, पलायन करने को मजबूर किया गया और यह क्रम आज भी जारी है. झारखंडियों की जमीन पर विकास के नाम पर बड़े-बड़े कल कारखाने, बड़े-बड़े बांध बने, खदान खुले, बड़े-बड़े प्रतिष्ठान बने और अभी भी बन रहे हैं. पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इन विकास के कल कारखानों को आधुनिक मंदिर कहा, पर दुर्भाग्य देखिए जिसकी जमीन पर ये आधुनिक मंदिर बने उसमें झारखंडियों को प्रवेश न मिला, और न मिला उस मंदिर का प्रसाद.

मिला क्या इस मंदिर का धोवन गंदा जल और गंदगियों का पहाड़. एक कमाते खाते, नाचते गाते बजाते समाज की जमीन पर आधुनिक मंदिर बनाया उसी जमीन मालिक को दर-दर की ठोकर खा कर जीने के लिए छोड़ दिया. क्या बिरसा ने इसी और ऐसे ही दिन के लिए उलगुलान किया था. झारखंड को शोषण मुक्त प्रदेश बनाने का सपना पूरा हुआ. कहां और किस दशा में है बिरसा के वंशज, उनके अनुयायी? जिन आंदोलनकारियों ने झारखंड को एक खुशहाल प्रदेश बनाने का आंदोलन चलाया आज वे अपने को खुशहाल बना लिये पर झारखंडी जनता की क्या दुर्दशा है यह भी बताने की जरूरत है.

आज पुन: नये बिरसा के आगमन की प्रतीक्षा है. जरा देखिए बिरसा मुंडा ने 1890 में जर्मन मिडिल स्कूल चाईबासा में अन्याय का सामना कैसे किया?

चाईबासा जर्मन मिशन के पादरी नोतरोत-स्वर्ग के राज्य के सिद्धांत पर विस्तार से प्रकाश डाल रहे थे. इसी क्रम में पादरी नोतरोत ने कहा यदि मुंडा आदिवासी लोग ईसाई बने रहे और उनके अनुदेशों का पालन करते रहे तो वे उन लोगों की छीनी हुई जमीन वापस करा देंगे.

(कुमार सुरेश सिंह-बिरसा मुंडा और उनका आंदोलन-पृ.39) एक ओर अंगरेज सरकार झारखंडियों की जमीन नीलाम कर रही थी मालगुजारी न देने पर, दूसरी ओर अंगरेजी सरकार की मशनरी मिशन उनकी जमीन वापसी करा कर धर्मातरित कर रही थी. आज की सरकार भी आदिवासी-सदान की जमीन विकास के नाम पर ले रही है पर उनके विकास और स्थापित करने की कोई चर्चा नहीं कर रही है. नेतागण जमीन बचाने का आंदोलन कर मालामाल हो रहे हैं. ये है दोहरा खेल.

पादरी नोतरोत ने एक दिन बिरसा मुंडा की उपस्थिति में कहा : ये मुंडा सरदार लोग बेइमान होते हैं. (धर्म परिवर्तन में बाधक होने के कारण) तुरंत बिरसा मुंडा ने इस पर प्रतिवाद किया-मुंडा लोग तो बेइमान क्या होता है उसे जानते भी नहीं और आज हमें बेइमान कह रहे हैं. जरा बताइए तो हम मुंडाओं ने किसकी धरती लूटी, किसका धन लूटा, किसका धर्म लूटा, किसकी धाक (राज्य) लूटी? ये सब तो आप लोग लूट रहे हैं. हमारा आदि धरम तक आप ने लूट लिया और हमें बेइमान कहते हैं.

पादरी नोतरोत ने कहा क्या है तुम्हारा धर्म, कौन है तुम्हारा मसीहा, कौन है तुम्हारा पैगंबर, कौन है तुम्हारा अवतारी? बिरसा ने कहा मैं हूं बीर ईसा (बिरसा) मैं हूं, अपने धर्म का मसीहा. इस विरोध के बाद बिरसा पढ़ाई और मिशन दोनों का त्याग कर चाईबासा से केन्दार गांव के कपड़ा बुनकर आनंद पांड के यहां आया जो रामायण, महाभारत और जड़ी-बूटी का अच्छा जानकार था. वहां आनंद पांड के पास क्यों आया इसकी एक मौखिक इतिहास है.

एक बार चाईबासा बाजार में बिरसा मुंडा अपने पिता सुगना उर्फ मसीह दास आनंद पांड से कपड़े खरीद रहे थे, तभी एक विदेशी पादरी आ कर आनंद पांड से पूछा चाईबासा का गिरजाघर कहां पर है? उस विचित्र रंगरूप वेश भूषा के पादरी से आनंद पांड ने पूछा आप कौन है? उसने कहा मैं पादरी हूं. आनंद पांड ने पूछा ये पादरी क्या होता है? पादरी ने कहा-पादरी स्वर्ग का रास्ता बताता है.

आनंद पांड को विचित्र व्यक्ति लगा वह कहा-तुम स्वर्ग का रास्ता जानते हो और गिरजा घर का रास्ता नहीं जानते कैसे पादरी हो? ये घटना पादरी नोतरोत के मुंडा सरदार बेइमान होते हैं की घटना के कुछ ही पहले की घटना थी. 21 वर्ष की उम्र में बिरसा उर्फ दाउद हमेशा के लिए ईसाई धर्म त्याग कर वैष्णव भक्त बुन कर आनंद पांड के पास आया और अपना दूसरा गुरु बनाया. बिरसा को पहले गुरु थे इलियास जयपाल नाग.

इसकी शिक्षा ईसाई मिशनरी स्कूल में बुजरू और चाइबासा में हुई थी. अत: 33 वर्ष के ईसा मसीह के मसीहा बनने, 12 चेला बनाने, चमत्कार करने, सेवा,त्याग प्रेम को अच्छी तरह आत्मसात कर लिया था बिरसा ने ऊपर से आंनद पांड से राम और कृष्ण से जाना कि कैसे रावण तथा कंस का अंत किया. वैसे ही अंगरेज और उनके सहयोगी मिशन को बिरसा ने कहा-साहेब साहेब एक टोपी. इन्हें केले के थम्भ की तरह बो..बो..बो करते एक ही बार में काट डालो. इस तरह मिशन वालों ने बिरसा मुंडा द्वारा गठित बिरसाइयत पंथ की लोक प्रियता को देखते हुए बालू बिरसा (पागल बिरसा) घोषित कर दिया था.

1897 में झारखंड में अचानक अकाल पड़ा.

लोग भूख से तड़प रहे थे तब अंगरेज बहादुर इंग्लैंड में महारानी विक्टोरिया की 50वीं जयंती पर जुबली मना रहे थे. तब बिरसा मुंडा को हजारीबाग जेल से मुक्त कर दिया गया था. 26 अगस्त 1895 को चलकद आश्रम से एसपी मियर्स, पादरी लास्टी और जमींदार जगमोहन सिंह गिरफ्तार कर लिये थे.

8 जनवरी 1900 को शैलरकण पहाड़ पर बिरसा की सभा में, जिसमें बच्चे और महिला भी थे, जिलाधीश स्ट्रीट फील्ड, कमिश्नर फोरबीस ने गोली चलवायी, जिसमें 400 से अधिक बिरसायइत मारे गये थे.

4 फरवरी 1900 को जराई केला के रोगतो गांव के सात मुंडाओं ने 500 रुपये के इनाम के लालच में सोते हुए बिरसा को खाट सहित बांध कर बंदगांव लाकर अंगरेजों को सौंप दिया था. मजिस्ट्रेट डब्ल्यू एस कुटुस की अदालत में बिरसा पर झूठा मुकदमा चलाया गया. बैरिस्टर जैकण ने बिरसा मुंडा की वकालत की, लेकिन अंगरेजों के महान न्याय व्यवस्था में सब व्यर्थ गया. अपने देश जाति समाज की मुक्ति के लिए लड़ने वाला क्या अपराधी होता है?

अंगरेजों ने दिखा दिया अदालत जनता को तबाह करने की जगह है. झारखंड के लिए कहें देश की आजादी के लिए अबुआ दिसुम अबुआ राज की स्थापना के लिए उलगुलान करने वाला महानायक भगवान बिरसा मुंडा रांची के पुराने जेल में 9 जून 1900 को आजादी का रास्ता दिखा संसार से विदा कर दिये गये.

बिरसा के नेतृत्व का उभरना तत्कालीन समय की मांग थी

डॉ इमानुएल बारला

प्रोफेसर इंचार्ज (इवनिंग), संत जेवियर्स कॉलेज, रांची

बिरसा मुंडा एक ऐसे महानायक हैं, जिन्होंने शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व एक आदिवासी नेता के रूप में किया. जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण की आहुति दी.

मुंडाओं ने 1895- 1900 में बिरसा के नेतृत्व में खूंटकटी के अधिकार को समाप्त करने के विरुद्ध उलगुलान किया. 1907-1908 में छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट बना. वे उलगुलान द्वारा अलग झारखंड राज्य की स्थापना चाहते थे. यदि सही मायने में देखा जाये, तो बिरसा मुंडा उस समय के राजनीतिक - सामाजिक परिस्थितियों की उपज थे. उनके पूर्व ही छोटानागपुर के आदिवासी सरदारों ने पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी. उनके प्रखर नेतृत्व का उभरना तत्कालीन समय की मांग थी.

बिरसा मुंडा के पूर्व अनेक आदिवासी नेताओं ने अंगरेजों के खिलाफ विद्रोह किया था. 1772-1780 में पहाड़िया विद्रोह हुआ. 1780-85 में तिलका मांझी के नेतृत्व में आदिवासियों ने अंगरेजों के खिलाफ विद्रोह किया. 1794 में विष्णु मानकी के नेतृत्व में मुंडा विद्रोह हुआ था.

1800-1802 में पलामू में भूखन सिंह के नेतृत्व में चेरो विद्रोह हुआ था. 1807 में तमाड़ इलाके में दुखन मानकी के नेतृत्व में मुंडा विद्रोह हुआ. 1831 में सिंदराय और बिंदराय मानकी ने अंगरेजी सरकार और स्थानीय शोषकों के विरुद्ध कोल विद्रोह किया था. सिदो-कान्हू, चांद - भैरव के नेतृत्व में संतालों ने भी अंगरेजों के खिलाफ विद्रोह किया था.

बिरसा मुंडा ने तीन महत्वपूर्ण लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उलगुलान किया. प्रथम, वे जल, जमीन और जंगल जैसे संसाधनों की रक्षा करना चाहते थे. दूसरा, नारी की यश - प्रतिष्ठा की रक्षा और सुरक्षा करना चाहते थे.

तीसरा, धर्म और संस्कृति की मर्यादा को बना कर रखना चाहते थे. उनके पूर्व जितने भी विद्रोह हुए, सब जमीन की रक्षा के लिए ही हुए. जबकि बिरसा मुंडा ने इन तीनों मुद्दों के लिए अपनी शहादत दी. आज वे लोगों के बीच ‘भगवान बिरसा' और ‘धरती अब्बा' (पृथ्वी पिता) के रूप में स्थापित हैं.

तत्कालीन मुंडा और आदिवासी समाज में बिरसा मुंडा का आगमन एक सामाजिक और धार्मिक सुधारवादी नेता के रूप में हुआ. वे ईसाई व वैष्णव दोनों धर्मो में दीक्षित हुए थे. लेकिन वे आदिवासी ‘सिंगबोंगा' एक परमात्मा की पूजा करते रहे. बिरसा मुंडा एक लोकप्रिय नेता के रूप में उभर कर आये, क्योंकि उन्होंने जमीन की रक्षा के लिए और शोषण के खिलाफ उलगुलान किया.

सभी आदिवासी अपनी जमीन की सुरक्षा चाहते थे.

उनका जन्म उलीहातू में हुआ था. उनकी गिरफ्तारी अंगरेज प्रशासन के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक जीआरके मेयर्स के नेतृत्व में 24 अगस्त 1895 को चलकद से हुई. उन्हें 19 नवंबर 1895 को भारतीय दंड विधान की धारा 505 के तहत दो वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनायी गयी.

30 नवंबर 1897 को रिहा किया गया. 1897 में रांची जिले में भारी अकाल पड़ा और 1898 में हैजा की महामारी फैली. 1899 की रबी फसल भी अच्छी नहीं हुई. तत्कालीन सरकार ने आदिवासियों की कोई परवाह नहीं की. ऐसे संकट के समय स्थानीय जमींदार व साहूकारों ने भी आदिवासियों का शोषण मनमाने ढंग से किया. इन स्थितियों को देख कर बिरसा मुंडा ने फिर से विद्रोह का रास्ता अख्तियार किया.

बिरसा मुंडा ने आंदोलन का नेतृत्व जंगलों में छुपते हुए किया. उनके सैकड़ों अनुयायी गिरफ्तार किये गये.

तीन फरवरी 1900 को रात्रि में चाईबासा के घने जंगलों से बिरसा मुंडा को गहरी नींद में सोते हुए गिरफ्तार कर लिया गया. उन्हें रांची बंदीगृह में रखा गया. उनकी मृत्यु बंदीगृह में ही हो गयी. यह एक असाधारण नायक का दुखद अंत था. इसके बाद उलगुलान बिखर गया, पर इसने छोटानागपुर में ब्रिटिश सरकार की नींव हिला दी.

इसी के परिणामस्वरूप वर्ष 1908 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम लागू हुआ, जिसमें आदिवासियों की जमीन की सुरक्षा का प्रावधान किया गया. आज बिरसा मुंडा हमारे बीच सशरीर विद्यमान नहीं, पर पूरे झारखंड में स्वतंत्रता की उनकी अकुलाहट की अनुगूंज अब भी बाकी है. वीर बिरसा, भगवान बिरसा, धरती अब्बा तुम्हें शत शत नमन.

शहीदों के इतिहास को आगे बढ़ाना होगा

दयामनी बरला

आंदोलनकारी, सामाजिक कार्यकर्ता

बिरसा मुंडा के उलगुलान का सपना अबुआ हाते रे अबुआ राईज स्थापित करना था. उन्होंने आंदोलनकारियों का आह्वान किया था दिकू राईज टुन्टू जना-अबुआ राईज एटे जना (दिकू राज खत्म हो गया-हमलोगों का राज शुरू हुआ).

बिरसा उलगुलान का सपना था, आदिवासियों के जल जंगल जमीन पर किये जा रहे कब्जा को रोकना, बेटी बहुओं पर हो रहे जुल्म को खत्म करना तथा आदिवासी समाज को तमाम तरह के शोषण दमन से मुक्त करना. बिरसा मुंडा का उलगुलान सिर्फ झारखंड से अंगरेजी साम्राज्यवाद को रोकना नहीं था, बल्कि देश को अंगरेजी हुकूमत से मुक्त करना था.

देश के स्वतंत्रता संग्राम के मैदान में बिरसा मुंडा, डोंका मुंडा सहित सिदो कान्हू, तिलका मांझी, सिंदराय बिंदराय जैसे आदिवासी शहीद देश के इतिहास के पहले संग्रामी थे. (1856-1900 का दशक). बिरसा मुंडा सिर्फ झारखंड ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जननायक रहे हैं.

इतिहास गवाह है कि इस राज्य की धरती को हमारे पूर्वजों ने सांप, भालू, सिंह, बिच्छू से लड़ कर आबाद किया है. इसलिए यहां के जल, जंगल, जमीन पर हमारा खूंटकट्टी अधिकार है.

हम यहां के मालिक है. जब जब हमारे पूर्वजों द्वारा आबाद इस धरोहर को बाहरी लोगों ने छीनने का प्रयास किया, तब तब यहां विद्रोह हुआ. इस राज्य के जल जंगल जमीन को बचाने के लिए तिलका मांझी, सिदो कान्हू, फूलो झानो, सिंदराय बिंदराय, वीर बिरसा मुंडा, गया मुंडा माकी मुंडा जैसे वीरों ने अपनी शहादत दी. इन शहीदों के खून की कीमत है छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 और संताल परगना काश्तकारी अधिनियम. इन कानूनों में कहा गया है कि आदिवासी इलाके के जल जंगल जमीन पर कोई भी बाहरी व्यक्ति प्रवेश नहीं कर सकता है.

यहां की जमीन का मालिक नहीं बन सकता है. हम सभी जानते हैं कि भारतीय संविधान में हमारे इस क्षेत्र को विशेष अधिकार मिला है, यह है पांचवीं अनुसूची क्षेत्र. इसे पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में जंगल, जमीन, पानी, गांव, समाज को अपने परंपरागत अधिकार के तहत संचालित, विकसित एवं नियंत्रित करने का अधिकार है.

झारखंड के इतिहास में आदिवासी शहीदों ने जून महीने को झारखंड में अबुआ हातु अबुआ राईज स्थापित करने के उलगुलान की तिथियों को रेखांकित किया है. नौ जून 1900 को बिरसा मुंडा की मौत जेल में अंगरेजों की धीमी जहर से हुई. 30 जून 1856 को संताल परगना के भोगनाडीह में करीब 15 हजार संताल आदिवासी अंगरेजों की गोलियों से भून दिया गया.

इस दिन को भारत के इतिहास में संताल हूल के नाम से जाना जाता है.

बिरसा मुंडा एक आंदोलनकारी तो थे ही, साथ ही समाज सुधारक व विचारक भी थे. यही कारण है कि समाज की परिस्थितियों को देखते हुए आंदोलन की रूपरेखा बदलते रहे. समाज में व्याप्त बुराइयों के प्रति लोगों को सजग और दूर रहने का भी आह्वान किया. उन्होंने कहा कि हड़िया मत पीना, उससे शरीर शिथिल होता है. इससे सोचने समझने की शक्ति कमजोर होती है. बिरसा मुंडा के नेतृत्व में मुंडा आंदोलनकारियों ने समझौता विहीन लड़ाई लड़ी.

बिरसा मुंडा ने गरीबी का जीवन जीते हुए अंगरेजों के शोषण दमन से अपने लोगों को मुक्ति दिलाना चाहा था. कहा जाता है कि जब गांव के एक व्यक्ति की मृत्यु हुई थी उस मृत शव के साथ चावल और कुछ पैसे भी गाड़ दिये गये थे. (आदिवासी समाज में शव के साथ कपड़ा, थोड़ा चावल व पैसा डाला जाता है).

भूखे पेट की वजह से बिरसा (बालपन में) उस पैसे को कब्र से निकालने पर मजबूर हुए. उस पैसे से उन्होंने चावल खरीद कर मां को पकाने के लिए दिया था. इस गरीबी के बावजूद भी बिरसा मुंडा ने कभी घुटने नहीं टेके.

बिरसा मुंडा समाज पर आने वाले खतरों को वह पहले से ही अवगत कराते रहे थे. जब अंगरेजों का दमन बढ़ने वाला था तब उन्होंने अपने लोगों से कहा-होयो दुदुगर हिजुतना रहडी को छोपाएपे (अंग्रेजों का दमन बढ़ने वाला है-संघर्ष के लिए तैयार हो जाओ).

नौ जनवरी 1900 को बिरसा मुंडा के नेतृत्व में अंगरेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष में खूंटी जिला स्थित डोंबारी बुरू आदिवासी शहीदों के खून से लाल हो गया था. उलगुलान नायकों को साईल रकब डोंबारी पहाड़ में अंगरेज सैनिकों ने रांची के डिप्टी कमिश्नर स्ट्रीटफील्ड की अगुआई में घेर लिया था.

स्ट्रीटफील्ड ने मुंडा आदिवासी आंदोलनकारियों से बार बार बिरसा मुंडा को उनको सौंपने का आदेश दे रहे थे. इतिहास गवाह है उलगुलान के नायकों ने अंगरेज सैनिकों के सामने घुटना नहीं टेके. सैनिक बार बार बिरसा मुंडा को गोलियों से भून देने की धमकी दे रहे थे, लेकिन आंदोलनकारियों ने बिरसा मुंडा को सरकार के हाथ सौंपने से साफ इनकार कर दिया.

जब बार-बार आंदोलनकारियों से हथियार डालने को कहा जा रहा था. तब नरसिंह मुंडा सामने आया और ललकारते हुए बोल. अब राज हमलोगों का है अंगरेजों का नहीं. अगर हथियार रखने का सवाल है तो, मुंडाओं को नहीं अंगरेजों को हथियार रख देना चाहिए और यदि लड़ाई की बात है तो मुंडा समाज खून के आखिरी बूंद तक लड़ने को तैयार है.

स्ट्रीटफील्ड ने फिर चेतावनी दी कि तुरंत आत्मसमर्पण करें नहीं तो गोलियां चलायी जायेगी. लेकिन आंदोलनकारी निर्भयता से डंटे रहे. सैनिकों की गोलियों से छलनी घायल एक-एक कर गिरते गये. डोंबारी पहाड़ खून से नहा गया. लाशें बिछ गयी. कहते हैं खून से तजना नदी का पानी लाल हो गया.

डोंबारी पहाड़ के इस रक्तपात में बच्चे जवान, वृद्ध महिला पुरुष सभी शामिल थे. आदिवासी में पहले महिला-पुरुष सभी लंबे बाल रखते थे. अंगरेज सैनिकों को दूर से पता नहीं चल रहा था कि जो लाश पड़ी हुई हैं, वह महिला की है या पुरुषों की. इतिहास में मिलता है, जब वहां नजदीक से लाशों को देखा गया तो कई लाशें महिलाओं व बच्चों की थी. इस सामूहिक जनसंहार के बाद भी मुंडा समाज अंगरेजों के सामने घुटना नहीं टेका.

जब बिरसा को खोजने अंगरेज सैनिक सामने आये, तो माकी मुंडा एक हाथ से बच्चा संभाले दूसरे हाथ से टांगी थामे सामने आयी. जब सैनिकों ने उनसे पूछा कि तुम कौन हो, तब माकी ने गरजते हुए कहा कि तुम कौन होते हो मेरे ही घर में पूछने वाले कि मैं कौन हूं?

बिरसा मुंडा के आंदोलन ने अंगरेज शासकों को महसूस करा दिया कि आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन की रक्षा जरूरी है.

इसी का परिणाम है सीएनटी एक्ट. इसमें मूल धारा 46 को माना गया, जिसमें कहा गया कि आदिवासियों की जमीन को कोई गैर आदिवासी नहीं ले सकता है. इस गौरवशाली इतिहास को आज के संदर्भ में देखने की जरूरत है. आज जब झारखंड की एक-एक ईंच जमीन पर देशी विदेशी कंपनियां कब्जा करने जा रही हैं.

भोजन, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा जो आम जनता की चीजें हैं, उसे सरकार व कंपनी मुनाफा कमाने वाली वस्तु बना रही है. ऐसी परिस्थिति में शहीदों के इतिहास को आगे बढ़ाने के लिए तमाम आदिवासी मूलवासी संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओ को पहल करनी होगी. बिरसा मुंडा के समय, आज के समय की तरह बुनियादी सुविधाएं नहीं थी. समाज अशिक्षित था. आने जाने की कोई सुविधा नहीं थी. फिर भी बिरसा मुंडा ने महसूस किया कि आदिवासियों को अपना राज चाहिए, अपना समाज, गांव, जंगल, जमीन, नदी पहाड़ चाहिए.

बिरसा ने महसूस किया था झारखंड की धरती जितनी दूर तक फैली है-यह उनका घर आंगन है. नदियां जितनी दूर तक बह रही है-उतना लंबा इस समाज का इतिहास है. पहाड़ की ऊंचाई के जैसी ऊंची हमारी संस्कृति है. इसकी रक्षा करना हमारा परम धर्म है.


http://www.prabhatkhabar.com/news/vishesh-aalekh/story/468696.html


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