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न्यूज क्लिपिंग्स् | भारत में विकसित नयी वैक्सीन की दुनियाभर में सराहना..

भारत में विकसित नयी वैक्सीन की दुनियाभर में सराहना..

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published Published on Mar 31, 2016   modified Modified on Mar 31, 2016
रोटावायरस डायरिया भारत सहित कई देशों में नवजात शिशुओं और बच्चों की मौत का एक प्रमुख कारण है. भारत में हर साल करीब नौ लाख बच्चों को इसके कारण अस्पतालों में भर्ती करना पड़ता है, जिनमें से 80 हजार से एक लाख बच्चों की मृत्यु हो जाती है.

लेकिन, इससे बचाव की विदेशी दवाएं इतनी महंगी थीं कि हर किसी के लिए उसका सेवन करना आसान न था. ऐसे में भारत सरकार द्वारा पिछले दिनों अपने देश में विकसित सस्ती वैक्सीन जारी किये जाने को देश-दुनिया में एक बड़ी उम्मीद के रूप में देखा जा रहा है. कैसे विकसित किया गया इसे और कितना असरदार पाया गया है यह टीका आदि समेत डायरिया के लिए जिम्मेवार वायरस और अन्य तथ्यों के बारे में बता रहा है आज का मेडिकल हेल्थ पेज...

वर्षों के प्रयास और अनेक परीक्षणों के बाद पिछले सप्ताह केंद्र सरकार ने बच्चों को डायरिया से बचानेवाले अब तक के सबसे सस्ते रोटावायरस वैक्सिन ‘रोटावैक' के इस्तेमाल की मंजूरी दी है. 

वैश्विक प्रतिरक्षण कार्यक्रम (यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम) के तहत विकसित इस देसी वैक्सिन को बच्चों में इम्यूनाइजेशन के लिहाज से एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भी इस वैक्सिन को असरदार बताते हुए इस्तेमाल की मंजूरी दी है. इस वैक्सिन का विकास करीब 35 सालों की लंबी अवधि में किया गया है. 

वर्ष 1985 में पहली बार नयी दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में इसका विकास शुरू किया गया था. इसकी बड़ी खासियतों में इसकी कीमत कम होना भी माना जा रहा है. बच्चों के इस वैक्सिन के एक डोज की कीमत 54 रुपये निर्धारित है, जबकि इसके कुल तीन डोज का मूल्य 162 रुपये होगा. हालांकि, इससे पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत में इस तरह के दो अन्य वैक्सिन को मंजूरी दे रखी है, लेकिन उनके तीन डोज की कीमत करीब 2,500 रुपये है.

देशभर में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में रोटावायरस से होनेवाला डायरिया मृत्यु के सबसे बड़े कारणों में से एक है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, देश में प्रति वर्ष 80 हजार से एक लाख बच्चों की रोटावायरस डायरिया के कारण मृत्यु हो जाती है. साथ ही प्रत्येक वर्ष करीब नौ लाख बच्चों को डायरिया के कारण अस्पतालों में भर्ती करना पड़ता है. 

इसके अलावा, इस बीमारी से पीड़ित होने के कारण 32.7 लाख बच्चों को देशभर में अस्पतालों की ओपीडी में जांच के लिए ले जाना पड़ता है. यह रोटावायरस टीका स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और विज्ञान मंत्रालय द्वारा पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत भारत में ही तैयार किया गया है. शुरुआत में इस टीके को चार राज्यों में शुरू किया जा रहा है- आंध्र प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और ओड़िशा. सरकार का लक्ष्य है कि इन टीकों के माध्यम से रोकी जा सकनेवाली बीमारियों से देशभर के ज्यादा से ज्यादा बच्चों को बचाया जा सके. 

क्या है रोटावैक 

यह एक रोटावायरस वैक्सिन है, जिसे तरल रूप में पैक किया गया है. इसे रोटावायरस गैस्ट्रोएंटेराइटिस से बचाव के लिए बनाया गया है. इसका प्रत्येक डोज 0.5 मिली है. बच्चे के जन्म के छह सप्ताह के बाद इसका पहला डोज दिया जा सकता है और चार सप्ताह के अंतराल पर अन्य दोनों डोज दिये जा सकते हैं.

भारत में इसे विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाली ‘भारत बायोटेक' के मुताबिक, इस वैक्सिन को यदि माइनस 20 डिग्री सेंटीग्रेड पर स्टोर करके रखा जाये, तो यह पांच वर्ष तक इस्तेमाल में लाया जा सकता है यानी निर्माण के करीब पांच वर्ष के बाद यह एक्सपायर होता है. लेकिन, इससे अधिक तापमान पर स्टोर करने की दशा में इसका जीवनकाल कम हो जाता है.

रोटावैक का विकास 

नयी दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में पहली बार वर्ष 1986-88 के दौरान उन नवजात शिशुओं में से ‘रोटावायरस स्ट्रेन 116 इ' को आइसोलेट किया गया, जिनमें इसके प्राथमिक लक्षण नजर आये. यहीं से इसके विकास की कहानी शुरू हुई. ‘भारत बायोटेक' ने इस वैक्सिन का विकास किया, जिसमें अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठनों से सहयोग लिया गया है.

इनमें से कुछ मुख्य हैं- भारत सरकार का बायोटेक्नोलॉजी विभाग. केइएम हॉस्पीटल, पुणे. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी. यूनाइटेड स्टेट्स नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ. बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन. रिसर्च काउंसिल ऑफ नॉर्वे. यूनाइटेड किंगडम डिपार्टमेंट फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट. 

‘भारत बायोटेक' के मुताबिक, इस वैक्सिन के असर को जांचने के लिए नवजात शिशुओं में इसका क्लिनिकल ट्रायल सितंबर, 2013 में शुरू किया गया, जिसे अब तक का सबसे बड़ा ट्रायल माना जाता है. 

मेडिकल सेक्टर की विख्यात मैगजीन ‘लैंसेट' में इसके परिणामों को प्रकाशित किया गया था. नयी दिल्ली स्थित ‘सेंटर फॉर द हेल्थ रिसर्च एंड डेवलपमेंट' और ‘सोसायटी फॉर एप्लाइड स्टडीज' समेत कुल तीन स्वास्थ्य संस्थानों में इस वैक्सिन के तीसरे चरण का क्लिनिकल ट्रायल किया गया था. पहले ही साल गंभीर किस्म के नॉन-वैक्सिन रोटावायरस गैस्ट्रोएंटेराइटिस के लिए रोटावैक को 56.4 फीसदी प्रभावी पाया गया था. यह वैक्सिन दो प्रकार का बनाया गया है. इसमें से एक सिंगल डोज वाला है और दूसरा चरणबद्ध रूप से तीन बार में दिया जाने वाला है. 

रोटावैक की खासियत 

- त्वरित इस्तेमाल : इसे इस्तेमाल में लाने में 10 सेकेंड से भी कम समय लगता है. रोटावायरस के अन्य वैक्सिन के मुकाबले इसे इस्तेमाल में लाना आसान है. 
- आसान हैंडलिंग : इस वैक्सिन की हैंडलिंग आसान है. इसका सील आसानी से खुल जाता है और तरल दवा का चिपचिपापन बहुत कम होता है. 
- कम मात्रा और ज्यादा प्रभाव : अन्य रोटावायरस वैक्सिन के मुकाबले बच्चों को इसकी बहुत कम खुराक (0.5 मिली) देनी होती है. 
- बेहतर स्वाद : इस वैक्सिन का स्वाद बेहतर है, जिसे मिठाई की तरह का टेस्ट दिया गया है. इस कारण बच्चे बिना किसी प्रतिरोध के इसे पी जाते हैं. 

(प्रस्तुति : कन्हैया झा)

क्या है डायरिया

आम तौर पर बच्चों को जब दिन में तीन या उससे ज्यादा बार लूज मोशन हो यानी सामान्य से ज्यादा बार दस्त की शिकायत हो, तो इसे डायरिया माना जाता है. इसमें ज्यादातर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल संक्रमण के लक्षण पाये जाते हैं, जो अनेक कारणों यथा- बैक्टीरियल, वायरल और पारासाइटिक ऑर्गेनिज्म्स से हो सकते हैं. 

इसका संक्रमण अक्सर दूषित भोजन या दूषित पेयजल से फैलता है या कई बार कुपोषण या बच्चों की देखभाल सही तरीके से नहीं करने की दशा में भी किसी व्यक्ति के संपर्क में आने पर फैलता है. डायरिया के गंभीर होने पर बच्चे के शरीर में तरल पदार्थ की कमी हो जाती है और कई बार यह बेहद खतरनाक हो जाता है. खासकर बड़े बच्चों और कुपोषण के शिकार या कम प्रतिरोधी क्षमतावाले बच्चों में यह बीमारी खतरनाक रुख अख्तियार कर लेती है.

क्या है रोटावायरस संक्रमण

दुनियाभर में नवजात शिशुओं और बढ़ती उम्र के बच्चों में होनेवाली डायरिया की गंभीर बीमारी का सबसे प्रमुख कारण रोटावायरस को माना गया है. इसके सबसे ज्यादा मामले तीन माह से लेकर दो साल तक के बच्चों में पाये जाते हैं. 

इसका वायरस तेजी से फैलता है और इस कारण बच्चों में इसका संक्रमण भी तेजी से होता है. आम तौर पर किसी पीड़ित व्यक्ति के संपर्क में आने, हवा में मौजूद इसके संक्रमण की चपेट में आने या प्रदूषित खिलौनों के संपर्क में आने की दशा में यह बीमारी फैलती है. शरीर में इसका संक्रमण होने के दो से तीन दिनों के बाद इसके लक्षण दिखाई देते हैं. बच्चे को उलटी-दस्त के साथ कई बार बुखार भी आता है और पेट में दर्द भी होता है. बच्चों में होनेवाला इसका पहला संक्रमण खतरनाक होता है.

हालांकि, इसका संक्रमण होने की दशा में बच्चों को ‘ओरल रीहाइड्रेशन थेरैपी' दी जाती है, लेकिन संक्रमण हो जाने के बाद उससे मुकम्मल बचाव के लिए कोई खास दवा अब तक उपलब्ध नहीं है.

ये भी जानें

डायरिया फैक्टशीट

- पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा कारण है डायरिया. 
- दुनियाभर में पांच वर्ष से कम उम्र वाले करीब 7,60,000 बच्चों की मृत्यु डायरिया से प्रत्येक वर्ष. 
- वैश्विक स्तर पर डायरिया के करीब 1.7 अरब मामले सामने आते हैं प्रत्येक वर्ष, सभी उम्र समूह के लोगों को मिला कर. 
- डायरिया का सबसे बड़ा कारण कुपोषण. 

डायरिया से बचाव के तरीके

- स्वच्छ पेयजल.
- सेनिटेशन का व्यवस्थित इंतजाम. 
- साबुन से हाथ धोना. 
- जन्म के पहले छह माह तक बच्चे को केवल स्तनपान कराना. 
- बच्चों को पोषक आहार देना.
- संक्रमण को फैलने से बचाव संबंधी शिक्षा.
- रोटावायरस वैक्सिनेशन. 

डायरिया का इलाज

- रिहाइड्रेशन : ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्ट्स यानी ओआरएस का घोल पिलाना. ओआरएस साफ पीने का पानी, नकम और चीनी को मिश्रण होता है. 
- जिंक सप्लीमेंट्स : इससे बार-बार होनेवाले दस्त को रोका जा सकता है. 
- पोषक खाद्य पदार्थ : कुपोषण से होने वाले डायरिया के इलाज के लिए बच्चों को पोषक खाद्य पदार्थ दिया जा सकता है. 

वर्ष 2025 तक डायरिया से बचाव 

की वैश्विक योजना 

डायरिया से बचाव के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अनेक देशों की सरकारों और संबंधित संगठनों से मिल कर इंटेग्रेटेड ग्लोबल एक्शन प्लान (प्रिवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ निमोनिया एंड डायरिया) तैयार किया है. इसमें निमोनिया को भी शामिल किया गया है. इन बीमारियों के कारण दुनियाभर में पांच साल से कम उम्र वाले करीब 20 लाख बच्चे प्रत्येक वर्ष जान गंवा देते हैं. 

इससे बचाव के लिए टीकाकरण पर जोर दिया जायेगा. वर्ष 2025 तक का टारगेट है- 90 फीसदी तक फुल-डोज कवरेज, जिसमें सभी जरूरी वैक्सीन शामिल किये जायेंगे और डायरिया केस मैनेजमेंट के लिए 90 फीसदी मामलों तक पहुंच सुनिश्चित करना. वर्ष 2010 में ‘यूनाइटेड नेशंस ग्लोबल स्ट्रेटजी फॉर विमेंस एंड चिल्ड्रेन्स हेल्थ' लॉन्च किया गया था. 

इसके तहत पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों के डायरिया से होेनेवाली मौतों को कम करने में काफी सफलता मिली है. मौजूदा ग्लोबल एक्शन प्लान में यह निर्धारित किया गया है कि डायरिया से होनेवाली बच्चों की मौतों की संख्या को बेहद न्यूनतम स्तर यानी प्रति एक हजार में से केवल एक के स्तर पर लाना है. 2010 में वैश्विक डायरिया के जोखिम के स्तर के मुकाबले 2025 तक उसमें 75 फीसदी तक की कमी लाना है. 
(स्रोत : विश्व स्वास्थ्य संगठन)

http://www.prabhatkhabar.com/news/special-news/story/746066.html


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