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न्यूज क्लिपिंग्स् | भोजन के वादे की हकीकत ।। देविंदर शर्मा ।।

भोजन के वादे की हकीकत ।। देविंदर शर्मा ।।

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published Published on Jul 8, 2013   modified Modified on Jul 8, 2013
खाद्य सुरक्षा कानून संबंधी अध्यादेश पर राष्ट्रपति ने अपनी मुहर लगा दी है. अब हर नागरिक को ‘भोजन का अधिकार' हासिल करने में सरकार मददगार की भूमिका निभायेगी. हालांकि, केंद्र सरकार पिछले कई वर्षो से इस कानून को लाने की कवायद में जुटी थी, लेकिन जानकारों का मानना है कि यह फैसला चुनाव नजदीक आते देख लिया गया है.

इस पूरे मामले में सरकार का पक्ष और इस कानून से किन्हें और क्या-क्या सुविधाएं हासिल हो सकती हैं, साथ ही इस कानून के समक्ष मौजूद चुनौतियों और चिंताओं को समेटने की कोशिश कर रहा आज का नॉलेज..

देश की आजादी के तकरीबन 66 वर्षो के बाद ही सही खाद्य सुरक्षा विधेयक लागू होने से आम जनता के लिए यह कानूनी अधिकार हो जायेगा. वैसे देश में पहले से ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) मौजूद है, लेकिन बहुत से तबके के लोग इस सुविधा से वंचित हैं.

तकरीबन 8 से 9 फीसदी प्रवासी मजदूरों को पीडीएस का फायदा नहीं मिल पाता है. अब इस नये कानून के दायरे में आनेवाले सभी लाभार्थियों का बायोमेट्रिक कार्ड बनाया जायेगा. देश के किसी भी हिस्से में जाने पर लाभान्वितों को इसकी सुविधा मिलेगी.

इसके प्रावधानों के तहत हर राज्य में एक राज्य खाद्य आयुक्त और केंद्र में एक राष्ट्रीय खाद्य आयुक्त की नियुक्ति की जायेगी. हालांकि, इस विधेयक में कहीं भी इस बात की चरचा नहीं की गयी है कि आखिरकार देश से भूख की स्थिति से निबटने में हम कब तक सक्षम होंगे. यानी देश में जीरो हंगर की खुशहाल स्थिति कब होगी. इसके लिए किसी समयबद्ध कार्यक्रम का अभाव है.

गांवों में ज्यादातर लाभार्थियों की दशा मनरेगा के लाभार्थियों की तरह हो जायेगी. लोग इस योजना पर निर्भर होते चले जायेंगे. जरूरत इस बात की है कि सरकार लोगों को सक्षम होने की तरफ ज्यादा ध्यान दे.

चीन की एक कहावत है कि किसी इनसान की तरक्की के लिए उसे मछली खिलाने की बजाय मछली को पकड़ने की तरकीब सिखानी चाहिए, ताकि वह भविष्य में भी अपना पेट भरने में सक्षम हो सके.

खाद्य सब्सिडी को नकद हस्तांतरण के रूप में दिया जाना राजनीतिक मकसद है, लेकिन भूख और कुपोषण से निबटने के प्रति गंभीरता नहीं दिखायी जा रही है. नकद हस्तांतरण की स्कीम को आगामी वर्ष 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए लागू किया जा रहा है. आधार परियोजना पर आधारित इलेक्ट्रॉनिक नकदी हस्तांतरण योजना को राजनीतिक पूर्वाग्रह के नजरिये से देखा जाना चाहिए.

विश्व बैंक के ‘सशर्त नकद हस्तांतरण, राजनीतिक भागीदारी और मतदान व्यवहार' शीर्षक से किये गये एक अध्ययन में बताया गया है कि कोलंबिया में वर्ष 2010 के चुनावों से पहले बिना शर्त नकदी हस्तांतरण कार्यक्रम लागू किया गया था. इस अध्ययन में बताया गया है कि उरुग्वे में भी वर्ष 2011 में बिना शर्त नकदी हस्तांतरण कार्यक्रम लागू किया गया.

इस व्यवस्था के लागू होने से सत्तासीन पार्टी को वहां दोबारा से सत्ता में आने में मदद मिली. भारत में भी आगामी चुनावों में तात्कालिक राजनीतिक लाभ की स्थिति को देखते हुए नकदी हस्तांतरण पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है. सरकार पूरे देश में गरीबों को खाद्य और उर्वरकों समेत अन्य चीजों पर सब्सिडी के तौर पर तीन लाख करोड़ रुपये सालाना सब्सिडी नकदी के तौर पर हस्तांतरित करेगी, लेकिन यह बात समझ से परे है कि बिना किसी फूल-प्रूफ सिस्टम के वह ऐसा कर पाने में कैसे सक्षम हो पायेगी.

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) से बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन इसके नतीजे बहुत अच्छे नहीं दिख रहे. कई अध्ययनों में इस ओर इशारा किया गया है कि इस स्कीम में तकरीबन 70 से 80 फीसदी तक गड़बड़ियां हैं और अभी तक ग्रामीण अर्थशास्त्र को बदलने में यह असफल रहा है.

देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस के तहत वितरित किये जानेवाले अनाज का 60 फीसदी से अधिक हिस्सा भ्रष्टाचार की जद में है. गरीब लाभार्थियों को यह पर्याप्त मात्र में नहीं मिल पा रहा है. अनाज वितरण का दुनिया का सबसे बड़ा भारत का सार्वजनिक वितरण तंत्र पटरी से उतर चुका है, जिसे और ज्यादा प्रभावी बनाने की जरूरत है.

ऐसा किया जाना भी निश्चित रूप से संभव है, लेकिन इसके लिए सही दिशा में कभी कोई कदम नहीं उठाया गया है. पिछले कुछ दशकों से देखा जा रहा है कि कुछ अंतरराष्ट्रीय ताकतें भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पटरी से उतारने में लगी हैं. इस दिशा में पहला प्रयास विश्व व्यापार समझौते के प्रारंभिक दिनों में उस समय किया गया जब आर्थर डंकल प्रस्ताव बनाया जा रहा था.

भारत के जबरदस्त विरोध के बाद प्रस्ताव में से इसे हटाया गया. बाद में खाद्यान्नों की खरीद और भंडारण की व्यवस्था के विकेंद्रीकरण के नाम पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में केंद्रीय पूल गठित करने का प्रयास किया गया और राज्यों को अनाज की खरीद, भंडारण और वितरण का प्रबंध करने को कहा गया. कई मुख्यमंत्रियों ने सरकार के इस विकेंद्रीकरण योजना का विरोध किया. कई सालों बाद एक बार फिर ऐसा किया जा रहा है.

भारतीय खाद्य निगम देश में घरेलू स्तर पर ज्यादा से ज्यादा अनाज खरीदने और उसके लिए अवसर पैदा करने को छोड़ कॉमर्शियल होता जा रहा है और गेहूं की फ्यूचर ट्रेडिंग (भविष्य का कारोबार) करते हुए मुनाफा कमाने में जुट गया है. अनाज मंडियों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज को खरीदने में एफसीआइ पूरी तल्लीनता नहीं दिखा रहा. यदि एक बार इस व्यवस्था को खत्म कर दिया गया, तो किसान कारोबारियों की दया पर जीने को मजबूर हो जायेंगे.

सरकार यदि जनता की भलाई चाहती है, तो उसे नौकरी के अवसर पैदा करने चाहिए. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2008 से 2009 के बीच जब देश की आर्थिक वृद्धि दर 8 से 9 फीसदी के करीब थी, उस समय 140 लाख किसानों ने खेती से मुंह मोड़ लिया था. छोटे-छोटे विनिर्माण उद्योगों से जुड़ी हुई तकरीबन 53 लाख नौकरियों से लोगों को हाथ धोना पड़ा था.

वर्तमान में हालात कुछ इस तरह के हैं कि देश में रोजाना ढाई हजार लोग खेती से खुद को अलग करते जा रहे हैं. यदि सरकार वाकई में देश की जनता की भलाई चाहती है, तो खेती से मुंह मोड़ रहे लोगों की समस्याओं को समझते हुए उन्हें खेती की ओर उन्मुख करने की योजना बनाये.

मौजूदा खाद्य सुरक्षा विधेयक में यह प्रावधान किया गया है, कि खाद्यान्न वितरण में कमी होने की दशा में राज्य अपने स्तर से अनाज का आयात कर सकते हैं. इसका सीधा असर हमारी खेती और किसानों पर पड़ेगा. जबकि ज्यादा से ज्यादा खाद्यान्न हासिल करने के लिए हमें देश में ही इसकी पैदावार को बढ़ाना चाहिए. इस मामले में केंद्र सरकार को छत्तीसगढ़ से सबक लेनी चाहिए.

छत्तीसगढ़ ने इस मामले में कुछ इस तरह का ढांचा बनाया है, जिसमें अनाज का ज्यादा से ज्यादा संग्रहण स्थानीय स्तर पर किया जाता है. इसके कई फायदे हैं. पहला तो खेती को स्थानीय स्तर पर बढ़ावा मिलता है. ज्यादा दूरी से अनाज मंगाने से उसकी बर्बादी के साथ ही उस पर ढुलाई खर्च भी ज्यादा आता है. सरकार को इससे जुड़े स्थानीय कारकों का ख्याल रखने से किसानों को ज्यादा फायदा होगा.
(बातचीत : कन्हैया झा)

देश की दो-तिहाई आबादी को मिलेगा सस्ता अनाज. वर्तमान में गरीबी रेखा से नीचे गुजारा करनेवाले परिवारों को चार से साढ़े चार रुपये प्रति किलो की दर से गेहूं और तकरीबन साढ़े पांच रुपये प्रति किलो की दर से चावल दिया जाता है. विधेयक के लागू होने के तीन वर्ष बाद कीमतों में संशोधन होगा.

इस विधेयक में 3 रुपये प्रति किलो की दर से चावल समेत 2 रुपये प्रति किलो की दर से गेहूं मुहैया कराया जायेगा. साथ ही अन्य मोटा अनाज एक रुपये प्रति किलो की दर से दिया जायेगा. अंत्योदय योजना के तहत आनेवाले परिवार प्रत्येक महीने 35 किलोग्राम अनाज पाने के हकदार होंगे.

इस स्कीम को ‘आधार' स्कीम के साथ जोड़ा जायेगा. प्रत्येक लाभार्थी को एक विशिष्ट पहचान नंबर दिया जायेगा, जो इसके डाटाबेस से जुड़ा होगा. इसमें सभी कार्डधारक का बायोमेट्रिक डाटा मौजूद होगा. लाभार्थी इसका फायदा देश के किसी भी इलाके में उठा सकता है.

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहनेवालों की संख्या तकरीबन 41 करोड़ है. इनकी रोजाना की कमाई 1.25 डॉलर से भी कम बतायी गयी है. शुरुआत में इस स्कीम को 150 पिछड़े जिलों में लागू किया जायेगा.

वर्तमान में हालात कुछ इस तरह के हैं कि देश में रोजाना ढाई हजार लोग खेती से खुद को अलग करते जा रहे हैं. यदि सरकार वाकई में देश की जनता की भलाई चाहती है, तो खेती से मुंह मोड़ रहे लोगों की समस्याओं को समझते हुए उन्हें खेती की ओर उन्मुख करने की योजना बनाये.

- 1.3 लाख करोड़ रुपये होगा फूड सिक्योरिटी बिल पर कुल सब्सिडी कवर
- 20 हजार करोड़ रुपये सरकार के खजाने पर पड़ेगा अतिरिक्त बोझ
- 67 फीसदी जनसंख्या को हर महीने 5 किलो अनाज प्रति व्यक्ति के हिसाब से
- 75 फीसदी ग्रामीण जनसंख्या को शामिल किया जायेगा इस योजना के अंतर्गत
- 50 फीसदी शहरी जनसंख्या आयेगी खाद्य सुरक्षा के दायरे में

खाद्य सुरक्षा कानून पर सरकार का तर्क

हालांकि खाद्य सुरक्षा कानून को भाजपा, वाम दल, तृणमूल कांग्रेस समेत ज्यादातर दल राजनीतिक रोटी सेंकने की कवायद करार दे रहे हैं, और इसे अधूरा प्रयास कह रहे हैं, लेकिन केंद्र सरकार के इस कानून को लेकर अपने तर्क हैं. क्या है केंद्र सरकार के अध्यादेश में और उन पर क्या है सरकार का तर्क आइये जानते हैं.

1. इस अध्यादेश के अनुसार, टीपीडीएस के अंतर्गत केवल 67 प्रतिशत जनसंख्या को इसका लाभ मिलेगा. सरकार का कहना है कि 2007-08 से 2011-12 तक औसतन प्रतिवर्ष लगभग 60.24 मिलियन टन खाद्यान्न की सरकारी खरीद की गयी है. इसकी तुलना में टीपीडीएस के अंतर्गत हर व्यक्ति को प्रति माह 5 किलो खाद्यान्न प्रदान करने के लिए 72.6 मिलियन टन खाद्यान्न की आवश्यकता होगी. खाद्यान्नों के वर्तमान उत्पादन और सरकारी खरीद को ध्यान में रखते हुए ही सिर्फ 67 फीसदी लोगों को इसके दायरे में लाया गया.
2. सवाल पूछा जा रहा है, कि जब पहले से अंत्योदय अन्न योजना काम कर रही है, तो इस योजना को शुरू करने का सबब क्या है? इस पर सरकार का कहना है कि वर्तमान में कुल प्रस्तावित परिवारों में से एक-चौथाई को ही 35 किलो प्रति परिवार के आधार पर नियत खाद्यान्न दिया जा रहा है. वहीं इस अध्यादेश में में अखिल भारतीय स्तर पर कुल जनसंख्या के 67 फीसदी हिस्से को 5 किलो खाद्यान्न देने का प्रस्ताव किया गया है.

इसमें एएवाइ परिवारों को, जो निर्धन में निधर्नतम हैं, को 35 किलो प्रति परिवार प्रति माह खाद्यान्न सुनिश्चित किया गया है. साथ ही वर्तमान में बीपीएल श्रेणी में आने वाले परिवार जिन्हें खाद्यान्न की मात्र कम मिलेगी, उन्हें सब्सिडी दरों पर अनाज मिलने का फायदा मिलेगा.

3. सवाल पूछा जा रहा है कि इस योजना में दालों और तेलों को क्यों नहीं शामिल किया गया. इस पर सरकार का कहना है, दालों और खाद्य तेलों की घरेलू मांगों को पूरा करने के लिए हम मुख्यत: आयात पर निर्भर हैं. इसके साथ ही दालों और तिलहन की खरीद के लिए आधारभूत ढांचा और संचालन प्रक्रिया भी मजबूत नहीं है, इसलिए यह फैसला लिया गया.

4. यह कहा जा रहा है कि इस कानून में खाद्यान्नों की आवश्यकता पूरी करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है और इसमें पोषकता पर कम ध्यान दिया है. इस पर सरकार का कहना है कि इस कानून में महिलाओं और बच्चों को पोषण प्रदान करने पर विधेयक में खास ध्यान दिया गया है.

गर्भवती महिलाओं और दूध पिलानेवाली माताओं को निर्धारित पोषकता मानकों के तहत पौष्टिक भोजन का अधिकार देने के साथ-साथ कम से कम 6000 रुपये के मातृत्व लाभ को भी इसमें शामिल किया गया है. 6 माह से 6 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों को घर में भोजन ले जाने या निर्धारित पोषकता मानकों के तहत गर्म पका हुआ भोजन पाने का अधिकार होगा.

5. सबसे बड़ा सवाल यह पूछा जा रहा है कि सरकार के पास विधेयक के नियमों के अंतर्गत पर्याप्त खाद्यान्न ही नहीं है. इस पर सरकार का कहना है कि प्रति वर्ष अन्य लाभकारी योजनाओं के लिए कुल 612.3 लाख टन खाद्यान्न की आवश्यकता होगी. सरकार का कहना है कि हाल के वर्षो में खाद्यान्नों के उत्पादन और खरीद में वृद्धि होने से इस मांग को पूरा कर लिया जायेगा.

6. सवाल पूछा जा रहा है कि खाद्य सुरक्षा विधेयक के कारण राज्यों पर जो बोझ पड़ेगा, वे उसकी भरपायी कैसे करेंगे? इस पर केंद्र सरकार का कहना है कि विधेयक का मुख्य वित्तीय प्रभाव खाद्य सब्सिडी पर पड़ेगा. प्रस्तावित क्षेत्र और पात्रता के अधिकार पर सालाना 612.3 लाख टन खाद्यान्न की आवश्यकता होने और वर्ष 2013-14 आधार पर खाद्य सब्सिडी की लागत 1,24,747 करोड़ रुपये होने का अनुमान है.

वर्तमान की टीडीपीएस और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए खाद्य सब्सिडी से तुलना करने पर सालाना 23,800 करोड़ रुपये अधिक की आवश्यकता होगी. इस अतिरिक्त आवश्यकता को केंद्र सरकार पूर्ण रूप से वहन करेगी.


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