‘गोदान’ के प्रकाशन के 75 साल पूरे हो गए हैं लेकिन भारत का देहाती जीवन आज भी लगभग उन्हीं समस्याओं और चुनौतियों से घिरा दिखता है जिनका वर्णन मुंशी प्रेमचंद के इस कालजयी उपन्यास में हुआ है. गोपाल प्रधान का आलेख सन 1935 में लिखे होने के बावजूद प्रेमचंद के उपन्यास 'गोदान' को पढ़ते हुए आज भी लगता है जैसे इसी समय के ग्रामीण जीवन की कथा सुन रहे हों....
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यूपी में किसान आंदोलन को फिर आग
लखनऊ [अवनीश त्यागी]। भट्टा पारसौल कांड से सुलगे भूमि अधिग्रहण विवाद की आग सियासी झोंकों से फिर भड़काने की तैयारी है। विपक्षी दल बसपा सरकार की नई अधिग्रहण नीति का जवाब देने की तैयारी कर चुके हैं। भाजपा व कांग्रेस जमीनी जंग के मैदान में उतरने की तैयारी कर चुके हैं तो सपा राष्ट्रीय अधिवेशन में इसके खिलाफ रणनीति बनाएगी। बीते हफ्ते लखनऊ में मुख्यमंत्री मायावती ने पहली बार किसान...
More »आरटीआई कानून- हंगामा है क्यों बरपा ?
जो कभी इसके पैरोकार थे वही सूचना का अधिकार अधिनियम के कानूनी शक्ल लेने के पाँच साल बाद इतने चिन्तित क्यों है ? किस लिए एक बार फिर से इस मुद्दे पर धरना, रैली, सम्मेलन और भूख-हड़ताल की बाढ़ सी आई हुई है ? इसकी एक वजह तो यही है कि सूचना का अधिकार कानून से जिस मौन क्रांति का चक्का चल पडा है, उसकी गति को निहित स्वार्थवश किए...
More »असरदार फनकारों के चमत्कार- शांतनु गुहा रे
अपनी तिकड़मों और पहुंच के ज़रिए हर सरकारी ताले को खोलने की क्षमता और हर लाल फीते की काट रखने वाले असरदार लोगों की सर्वव्यापी मगर अदृश्य दुनिया...शांतनु गुहा रे की रिपोर्ट . पिछले महीने का एक शांत मंगलवार. मध्य दिल्ली के एक पांच सितारा होटल की सबसे ऊपरी मंज़िल. रेस्टोरेंट की दर्जनों मेजों में से सिर्फ चार पर ही लोग नज़र आ रहे हैं. एक मेज पर एक पूर्व वरिष्ठ...
More »ज्ञान की रोशनी फैलाने में जुटा लोकनाथ पाठागार
बालेश्वर। सरकार ने देश के सभी बच्चों को शिक्षा देने के लिए एक कानून बनाया है। जिससे कोई अनपढ़ न रहे किन्तु यहां हम एक ऐसे युवक की बात करने जा रहे है, जो सन् 1990 से अपने गांव के छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गो तक को शिक्षित करने का काम कर रहा है। पर हम जिस नौजवान की बात करने जा रहे है, यह अविवाहित है तथा बेरोजगार है। इस युवक ने लोगों...
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