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गेहूँ खरीद में कमी संभव : यूएसडीए

अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसडीए) ने एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत में वर्ष 2010-11 में गेहूँ की खरीद 20 से 30 लाख टन घटने की उम्मीद है जो पिछले वर्ष 2.54 करोड़ टन के रिकार्ड स्तर पर पहुँच गई थी। यूएसडीए ने कहा है, 'वर्ष 2010-11 के पूरे विपणन वर्ष (अप्रैल.मार्च) के दौरान खरीद अब वर्ष 2009-10 के 2.54 करोड़ टन से 20 से 30 लाख टन कम रहने की उम्मीद है जो उत्पादन की कमी...

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ज्यादा अनाज के लिए अब देनी होगी अधिक कीमत

नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। उपभोक्ताओं को रियायती दर की राशन दुकानों से अब और अनाज दिया जाएगा। इसके लिए केंद्रीय खाद्य मंत्रालय हर महीने पांच लाख टन अतिरिक्त अनाज का आवंटन करेगा। यह व्यवस्था अगले छह महीने के लिए की गई है। इस नए प्रावधान से सरकारी खजाने पर कुल 2,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। यह फैसला वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता वाले मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह [ईजीओएम] की बुधवार को आयोजित...

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मनरेगा में करोड़ों का फर्जीवाड़ा

भोपाल। केंद्र सरकार की राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना (नरेगा ) जो अब महात्मा गाधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना (मनरेगा) के नाम से जानी जाती है। इस योजना का उद्देश्य था कि क्षेत्र के मजदूरों को अपने ही गाव में काम मिले और वे पलायन नहीं कर सकें, लेकिन अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से काम मशीनों द्वारा करा लिए जाते है, जिससे मजदूरों को काम नहीं मिल पाता। इस कारण गरीब परिवार काम के सिलसिले में...

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किसानों की आत्महत्याः एक 12 साल लंबी दारूण कथा

   कुछ लोगों के लिए किसानी मुनाफे का धंधा हो सकती है, लेकिन देश की बहुसंख्यक आबादी के लिए यह घाटे का सौदा बना दी गई है. न सिर्फ घाटे का सौदा, बल्कि मौत का सौदा भी. और यह सिर्फ इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि खेती से महज कुछ लोगों का मुनाफा सुनिश्चित रहे. यही वजह है कि खेतिहरों के कर्जे की माफी का फायदा भी आम खेतिहरों को नहीं मिला बल्कि बड़े किसानों को...

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यह शर्मनाक सौदा लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है!- पी साईनाथ

हाल ही में संपन्न हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में पार्टियों और उम्मीदवारों के द्वारा अपने प्रचार के लिए मीडिया में धन का जम कर इस्तेमाल हुआ। अपने किसी भी चुनावी कवरेज के लिए एक उम्मीदवार को धन के इस संगठित खेल का हिस्सा होना पड़ा या कहें तो जबरन मजबूरी में इसका हिस्सा होना पड़ा। क्योंकि ऐसी धन संस्कृति का मीडिया में इस्तेमाल होने लगा है कि पैसा नहीं तो कवरेज भी नहीं। मीडियाई दुनिया...

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