मोंगाबे हिंदी, 17 नवम्बर उत्तर प्रदेश के वाराणसी में विश्व-प्रसिद्द बनारसी साड़ी बनाने वाले कई बुनकरों की तरह ही उनत्तिस साल के उबैद अहमद भी बिजली की अपर्यात आपूर्ति और बेवक्त कटौती को लेकर परेशान थे। बिजली की अपर्यात आपूर्ति की वजह से कारीगरों को अपने काम के घंटे और बुनाई पूरी करने के लिए रात में देर तक काम करना पड़ता था, वहीं बेवक्त कटौती से उनके माल की गुणवत्ता...
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गुजरात की स्थानीय पाटनवाड़ी ऊन और भेड़ों की मांग में गिरावट
मोंगाबे हिंदी, 26 अक्टूबर जब हम गुजरात की देशी नस्ल की भेड़ पाटनवाड़ी की तलाश में निकले, तो हमें कच्छ का वह एक दिन काफी लंबा लगा था। काफी तलाश के बाद हमें कुछ ही भेड़े मिल पाई। घटती मांग के चलते आज राज्य में इस नस्ल की 5,000 से भी कम भेड़ें बची हैं। भुज से नखत्राणा की ओर लगभग 80 किलोमीटर के सफर के बाद हमें एक मालधारी नौबा जडेजा...
More »सौर ऊर्जा वाले करघों से बदल रही है भारत के रेशम बुनकरों की ज़िंदगी
द थर्ड पोल , 27 सितम्बर असम के कोकराझार जिले के भौरागवाजा गांव में बुधरी गोयारी, अपने आंगन में ‘एरी’ रेशम के कोकून की रीलिंग में व्यस्त हैं। रेशम के कोकून के अपने कंटेनर के पास, गोयारी, सौर ऊर्जा से चलने वाली रीलिंग मशीन के साथ बैठी हैं। बोडो जनजाति की गोयारी, भारत के आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों की उन 20,000 महिलाओं में से एक हैं, जिनके पास दिल्ली स्थित एक सामाजिक...
More »गुरेज़: पट्टू बुनकरों की रेशा-रेशा बिखरती ज़िंदगी
पारी हिंदी, 28 अगस्त अपना आख़िरी पट्टू बुने हुए अब्दुल कुमार मागरे को कोई 30 साल हो गए हैं. वह कश्मीर की भयानक सर्दियों - जब तापमान -20 डिग्री से भी नीचे चला जाता है - से बचाव करने के लिए मशहूर इस ऊनी कपड़े को बुनने वाले कुछ आख़िरी बचे हुए बुनकरों में एक हैं. अब्दुल (82) याद करते हुए कहते हैं, “मैं एक दिन में तक़रीबन 11 मीटर कपड़े बुन...
More »‘दिन-रात मेहनत के बाद भी मेरी आमदनी न के बराबर है’
पारी, 20 जुलाई एक सामान्य आकार के पश्मीना शॉल के लिए सूत कातने में फ़हमीदा बानो को एक महीने लग जाते हैं. चांगथांगी बकरियों से मिलने वाले मुलायम और बारीक ऊन को अलग कर उनकी कताई करना कड़ी मेहनत और सफ़ाई का काम है. क़रीब 50 साल की ये कारीगर बताती हैं कि महीने भर की मेहनत के बदले में उन्हें बमुश्किल 1,000 रुपए मिलते हैं. “अगर मैं लगातार काम करूं,...
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