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चर्चा में.... | अर्थशास्त्र की ऊंची मीनार से कुपोषण मिटाने की यह कवायद....
अर्थशास्त्र की ऊंची मीनार से कुपोषण मिटाने की यह कवायद....

अर्थशास्त्र की ऊंची मीनार से कुपोषण मिटाने की यह कवायद....

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published Published on May 29, 2013   modified Modified on May 29, 2013

भारतीयों को विवाद-प्रिय माना जाता है और हमारी यह विवादप्रियता एक बार फिर से उठान पर है ! गरीबी-रेखा और गरीबों की तादाद के बारे में लंबे समय तक वाक्युद्ध में उलझे रहने के बाद, प्रसिद्ध अनिवासी भारतीय(एनआरआई) अर्थशास्त्रियों ने एक बार फिर से विवाद छेड़ा है कि भारत में कुपोषण का विस्तार कितना है। पहले योजना आयोग ने गरीबों की संख्या को कागजी तौर पर घटाने की कोशिश की थी और इस क्रम में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन तथा आधिकारिक समितियों मिसाल के लिए एनसीईयूएस के इस आकलन से आंखें मूंद ली थीं कि 80 फीसदी भारतीय 20 रुपये रोज के खर्चे से भी कम में गुजारा करने को बाध्य हैं। और कुछ ऐसा ही तर्जे-बयां है कोलंबिया में रहने वाले अर्थशास्त्री अरविन्द पानागरिया का जो बड़े मौलिक तरीके भारत के सर पर लगा शर्म का बड़ा दाग(कुपोषण) पोंछ डालना चाहते हैं। (कृपया रिपोर्ट को विस्तार से देखने और भुखमरी तथा कुपोषण पर इन्कूलिसिव मीडिया द्वारा पोस्ट की गई शेष कहानियों के लिए देखें नीचे दी गई लिंक्स)


यह विवाद थमने के बजाय अभी और आगे बढ़ेगा क्योंकि पानागरिया और उनके सह-लेखक अर्थशास्त्री जगदीश भगवती ने अपनी नई किताब में भारत में भोजन का अभाव झेल रहे व्यस्क लोगों की कुल तादाद के बारे में नये सिरे से प्रश्न खड़े किए हैं।


भारत में भुखमरी या फिर खाद्य-सुरक्षा का विधान बनाने की बात से जुड़ी बहस हो तो बड़े हाहाकारी आंकड़े सामने रखे जाते हैं। एक तो यह कि भारत में पाँच साल से कम उम्र के 43 फीसदी बच्चे सामान्य से कम वज़न के हैं और सामान्य से कम लंबाई के बच्चों की तादाद 48 फीसदी है। (ध्यान रहे: ये आंकड़े 2005-06 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के हैं और भारत सरकार की तरफ से इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्तर कोई और आकलन अद्यतन प्रस्तुत नहीं किया गया है)। टिप्पणीकारों का कहना है कि कपोषण का विस्तार बतलाने वाले ये आंकड़े संख्या के लिहाज से अब कम होने चाहिए लेकिन इस दिशा में प्रगति बड़ी धीमी है भले ही देश लगातार आर्थिक तरक्की की राह पर हो।


पानागरिया ने अपनी किताब के प्रचार के सिलसिले में कई साक्षात्कारों में यह बात उठायी है कि यह संख्या समस्या को अतिशयोक्ति की हद तक बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है। कारण कि भारत के बच्चों की लंबाई और वज़न मापते समय मानदंड वही अपनाया जाता है जो विश्व-स्वास्थ्य संगठन ने साल 2006 में तय़ किया था और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय किए गए मानदंड से माप कम आये तो इसे पोषण की कमी के रुप में दर्ज किया जाता है, और इस क्रम में आणुवांशिक विभिन्नता की उपेक्षा की जाती है। पानागरिया का तर्क है कि उप-सहारीय अफ्रीकी देशों की तुलना में भारत में बाल-मृत्यु दर और मातृ-मृत्यु दर कम है साथ ही इन देशों की तुलना में भारत में प्रति व्यक्ति आय और आयु-संभाविता भी ज्यादा है फिर ऐसा कैसे संभव है कि इन देशों की तुलना में भारत में बा-कुपोषण की दर ज्यादा हो। इसके अतिरिक्च पानागरिया के अनुसार यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानदंड को स्वीकार करते हुए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों को देखें तो निकल कर आएगा कि भारत के सर्वाधिक अमीर परिवारों में भी 15 फीसदी बच्चे सामान्य से कम लंबाई के हैं और इससे संकेत मिलता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानदंड भारत में कुपोषण का विस्तार जानने के लिहाज से खास मददगार नहीं।


पानागरिया के तर्क का जवाब कई लोगों ने दिया है जिसमें प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन भी शामिल हैं। उनका कहना है कि आणुवांशिक-भिन्नता के तर्क ने उच्चतर शोध-अध्ययनों में अपनी साख लगातार खोयी है। अमर्त्य सेन का कहना है कि पानागरिया भारत और अफ्रीका के आंकड़ों की तुलना करते समय उसका कुपाठ कर रहे हैं।


पानागरिया के तर्क से जिन लोगों को रोष आया है उसमें नव-उदारवाद विरोधी संस्था सन्हति से जुड़े दीपांकर बसु और अमित बसोले का नाम शामिल है। बसोले और दीपांकर बसु ने पानागरिया के तर्क में अवधारणागत कई दोष गिनाये हैं। इन विद्वानों के अनुसार-: " उम्र के अनुसार लंबाई और वज़न कुपोषण के मानदंड माने जाते हैं और इस मामले में कुपोषण का कारण माना जाता है भोजन में ऊर्जा और प्रोटीन की कमी को। जन्म के समय आयु-संभाविता, शिशु मृत्यु-दर और पाँच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर किसी देश की आबादी के सेहतमंद होने के बड़े मापक हैं और ये पोषण से तो प्रभावित होते ही हैं, इन पर अन्य बातों का भी असर पड़ता है, जैसे- सामान्य माने जाने वाले संक्रमणों को रोकने के लिए किया गया टीकाकरण, संस्थागत स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच(मिसाल के लिए प्रसव के समय), साफ-सफाई का स्तर, जानलेवा रोग जैसे एड्स का विस्तार और सामाजिक-आर्थिक संघर्ष तथा हिंसा का स्तर। इस तरह दो देशों की तुलना में बहुत संभव है कि एक देश में बच्चों के पोषण का स्तर ऊँचा या फिर दूसरे देश के बच्चों के पोषण के समान ही हो लेकिन आयु-संभाविता, शिशु-मृत्यु दर या फिर बाल-मृत्यु दर के मामले में वह देश तुलनात्मक रुप से नीचे हो।" ( देखें सन्हति की लिंक नीचे)


पानागरिया के तर्क का बिन्दुवार खंडन करते हुए ट्रांसफार्म न्यूट्रीशन के स्टुअर्ट गिलेस्पी का कहना है कि पानागरिया भारत और अफ्रीका के बीच के अंतर को बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रहे हैं और बच्चों का वज़न कहीं भी औसत से कम ज्यादा मात्रा में मिले तो इसका कारण आणुवांशिक नहीं माना जा सकता। (देखें नीचे दी गई लिंक) ट्रांसफार्म न्यूट्रीशन नीति-निर्माताओं, नागरिक संगठनों और व्यवसाय से जुड़े नेतृवर्ग के साथ मिलकर कुपोषण की समस्या के समाधान के लिए काम करता है।


दो जून की रोटी जुटाने के चक्कर में भारत में जिन लोगों को रोजाना अमानवीय अनुभवों से गुजड़ना पड़ता है उनके दुःख-दर्द से, आंकड़ों और विशेषज्ञ-वचन के ऊपर बाल की खाल निकालने वाली यह कवायद, एक सीमा के बाद भटकाने और बरगलाने वाली बन जाती है। उत्तरप्रदेश के मुसहर समुदाय पर केंद्रित अपने एक हालिया नृतत्वशास्त्रीय अध्ययन में शिल्पी शिखा सिंह ने बताया है कि शोध-अध्ययन के दौरान जिन परिवारों से उनकी भेंट हुई वे भोजन की कमी के शिकार थे लेकिन इस कमी को भुखमरी ना बताकर उपवास करना कह रहे थे। भुखमरी से निपटने का यही उनके पास उपचार था।


इस कथा का विस्तार निम्नलिखित लिंक्स पर उपलब्ध है-

Pangariya’s articles: (http://indianeconomy.columbia.edu/sites/default/files/pape
r_8-panagariya.pdf
) and (http://www.epw.in/system/files/pdf/2013_48/18/Does_India_R
eally_Suffer_from_Worse_Child_Malnutrition_Than_SubSaharan
_Africa.pdf
)

Sanhati link: http://sanhati.com/excerpted/5950/

http://www.transformnutrition.org/2013/01/24/when-myth-is-
reality/

http://sanhati.com/excerpted/5950/

Transform nutrition link: http://www.transformnutrition.org/2013/01/24/when-myth-is-
reality/

Shilp Shikha Singh: http://www.epw.in/system/files/pdf/2013_48/20/Intervention
_Identity_and_Marginality.pdf

Livemint:

http://www.livemint.com/Opinion/lpgcGwAkGZzoSiioqZdCoI/Is-
malnutrition-in-India-a-myth.html

im4change alerts: Child’ dismal world and under-five mortality (http://www.im4change.org/news-alerts/childs-world-miserabl
e-highest-under-5-mortality-17147.html
)

Save the Children from Hunger and malnutrition (http://www.im4change.org/news-alerts/save-the-children-fro
m-hunger-malnutrition-13851.html
)

and India accounts for 22% of global maternal deaths (http://www.im4change.org/news-alerts/india-accounts-for-22
-per-cent-of-global-maternal-deaths-504.html
)

Richer States Poorer Performances in reducing malnutrition (http://www.im4change.org/news-alerts/richer-states-poor-pe
rformance-in-reducing-malnutrition-122.html
)

Who moved my poverty report? (http://www.im4change.org/news-alerts/who-moved-my-poverty-
report-please-save-your-copy-fast-17376.html
)

Climate Change will worsen child malnutrition (http://www.im4change.org/news-alerts/climate-change-will-w
orsen-child-malnutrition-666.html
)

 

 



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