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चर्चा में.... | नागरिक संगठनों ने की नये बजट में सामाजिक सुरक्षा योजना पर आबंटन बढ़ाने की अपील
नागरिक संगठनों ने की नये बजट में सामाजिक सुरक्षा योजना पर आबंटन बढ़ाने की अपील

नागरिक संगठनों ने की नये बजट में सामाजिक सुरक्षा योजना पर आबंटन बढ़ाने की अपील

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published Published on Jan 28, 2016   modified Modified on Jan 28, 2016
नये बजट की चल रही तैयारियों के बीच नागरिक संगठनों ने वित्तमंत्री से मांग की है कि सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों के लिए आबंटन बढ़ाया जाय.(देखें नीचे दी गई लिंक)

 
जनवरी माह के पहले पखवाड़े में तकरीबन 20 नागरिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने बजट-पूर्व परामर्श के तहत वित्तमंत्री अरुण जेटली से भेंट की और तुरंत बाद के अपने प्रेस सम्मेलन में समवेत रुप से ध्यान दिलाया कि अपेक्षाकृत गरीब राज्यों में समेकित बाल विकास कार्यक्रम(आईसीडीएस), मध्याह्न भोजन योजना(मिड डे मील) तथा राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल योजना जैसे सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों में वर्ष 2015-16 के लिए बजट-आबंटन बुरी तरह प्रभावित हुआ है.

 
नागरिक संगठनों के अनुसार वित्तमंत्रालय को चाहिए कि वह वर्ष 2015-16 के पुनरीक्षित बजट तथा वर्ष 2016-17 के बजट में सामाजिक सुरक्षा योजनाओं विशेषकर मिड डे मील स्कीम, आईसीडीएस तथा राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल योजना के लिए आबंटन बढ़ाये.

 
सेंटर फॉर बजट एंड गवर्नेंस अकाउंटबिलिटी(सीबीजीए) के कार्यकारी निदेशक सुब्रत दास ने ध्यान दिलाया कि बीते वर्ष 14 वें वित्त आयोग की सिफारिशों के मुताबिक केंद्रीय बजट के ढांचे में बदलाव किए गए थे. इस बदलाव के कारण हालांकि राज्यों को पहले की तुलना में खुली धनराशि(अनटाय्ड फंड) ज्यादा मिल रही है लेकिन कुछ गरीब राज्यों को उपलब्ध निवल वित्तीय संसाधन में कमी आ गई है.
 
 
सुब्रत दास के अनुसार केंद्रीय बजट के ढांचे में बदलाव के बाद हालांकि राज्यों को अपनी बजटीय प्राथमिकताओं को तय करने के मामले में ज्यादा स्वायत्तता मिली है तो भी हमें यह बात याद रखनी होगी कि बिहार, ओड़ीशा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश तथा राजस्थान जैसे राज्य अपने बजट के लिए संसाधन जुटाने के मामले में केंद्र से हासिल रकम पर बहुत ज्यादा निर्भर है. इन राज्यों में सामाजिक सुरक्षा पर सरकारी निवेश बढ़ाने के लिहाज से केंद्र सरकार को चाहिए कि वह सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों पर किए जा रहे खर्चे में कमी ना करे. 

 
सीबीजीए के निदेशक के अनुसार शुरुआती पड़ताल से पता चलता है कि बिहार, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश तथा ओड़ीशा जैसे राज्य केंद्र से मिली खुली धनराशि का इस्तेमाल ऊर्जा और लोक-निर्माण के कार्यों पर ज्यादा कर रहे हैं जबकि ग्रामीण विकास तथा पंचायती राज से संबंधित कामों पर इन राज्यों का खर्चा कम हो गया है. 

 
जन स्वास्थ्य अभियान की तरफ से रवि दुग्गल ने बताया कि तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद भारत में स्वास्थ्य के मद में सरकारी खर्चा बहुत कम है जबकि सार्विक स्वास्थ्य पर केंद्रित उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह की सिफारिश है कि 12 वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक सार्वजनिक स्वास्थ्य के मद में सरकारी खर्च सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 प्रतिशत हो जाना चाहिए. साल 2012 में देश में स्वास्थ्य के मद पर हुए कुल खर्च में लोगों की जेब से हुए खर्च का हिस्सा 58 प्रतिशत था. कुछ राज्यों जैसे मिजोरम, सिक्किम, गोवा तथा पदुचेरी ने इस मामले में अच्छा काम किया है जहां स्वास्थ्य के मद में सरकारी खर्चा सालाना प्रतिव्यक्ति 3000 रुपये है. 

 
दुग्गल के अनुसार भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली कई समस्याओं से जूझ रही है- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डाक्टरों और नर्सों की कमी क्रमशः 76 प्रतिशत और 52 प्रतिशत है, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर बहुत कम राशि खर्च की जाती है और इसे चार गुना बढ़ाया जाना चाहिए, साथ ही सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में जवाबदेही की भावना की बहुत ज्यादा जरुरत है. इसे सुनिश्चित करने पर पूरी प्रणाली को कारगर बनाने में मदद मिलेगी. 

 
वाटर ऐड के प्रतिनिधि के रुप में ममता दास ने बताया कि राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के लिए साल 2014-15 और 2015-16 में बजट आबंटन घटा है. ममता दास के अनुसार विभिन्न संगठनों ने 2014-15 में स्वच्छ भारतकोश के लिए 349 करोड़ का दान दिया और स्वच्छ भारत अभियान पर जोर बढ़ने के कारण इस दानराशि में बढ़ोत्तरी होने की संभावना है. इसके अतिरिक्त 15 नवंबर 2015 से सेवाकर के दायरे में आने वाली तमाम सेवाओं पर 0.5 प्रतिशत का स्वच्छ भारत सेस लगाया गया है. विश्वबैंक ने भी स्वच्छ भारत मिशन के ग्रामीण अंचल वाले हिस्से के पर अमल के लिए डेढ़ अरब डॉलर देने का वादा किया है. इसलिए, ममता दास के अनुसार प्राप्त धन को ग्रामीण भारत के सबसे वंचित और कमजोर तबके के स्वच्छता संबंधी जरुरतों पर खर्च करने के लिए जवाबदेही, पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के साथ-साथ लक्ष्यकेंद्रित अभिगम अपनाने की आवश्यकता है.   

 
प्रेस-सम्मेलन को चाइल्ड रिलीफ एंड यू(क्राई) के कोमल गनोतरा तथा राइट टू एजुकेशन फोरम के अम्बरीष राय ने भी संबोधित किया और क्रमशः समेकित बाल विकास कार्यक्रम तथा शिक्षा पर बजट आबंटन बढ़ाने पर जोर दिया. सम्मेल को संबोधित करने वाले अन्य प्रमुख वक्ताओं के नाम हैं नेशनल कंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइटस् के पॉल दिवाकर, एक्शन ऐड के संदीप चरचा तथा राइट टू फूड की दीपा सिन्हा. 

 
प्रेस सम्मेल में शामिल वक्ताओं की राय विस्तार से जानने के लिए देखें हमारा अंग्रेजी न्यूज एलर्ट
 
इस कथा के विस्तार के लिए निम्नलिखित लिंक देखे जा सकते हैं---
 

Please click here to access the original press release from the organizers - People’s Budget Initiative (PBI).  

 

 

Please click here to access the submission to the Ministry of Finance by WaterAid during the Pre-Budget Consultation dated 12 January 2016

Please click here to access the Short note prepared by various NGOs on Continuum of Maternal and Early Childhood care: Urgent need for policy and budget focus

Please click here to access the submission to the Ministry of Finance by Right to Food Campaign during the Pre-Budget Consultation dated 12 January 2016

Please click here to access the submission to the Ministry of Finance by Jan Swasthya Abhiyaan during the Pre-Budget Consultation dated 12 January 2016

Please click here to access the submission to the Ministry of Finance by ActionAid during the Pre-Budget Consultation dated 12 January 2016


References


Of Bold Strokes and Fine Prints: Analysis of Union Budget 2015-16, Centre for Budget and Governance Accountability (CBGA), please 
click here to access 
 

Union Budget Speech 2015-16, please click here to access

 

 

Social sector asks Jaitley to review subsidy alternatives -TCA Sharad Raghavan, The Hindu, 12 January, 2016, please click here to access 

 

 

Give highest priority to rural job guarantee scheme in Budget, eminent citizens tell Jaitley, The Hindu Business Line, 12 January, 2016, please click here to access

'Release Rs 5,000 crore for MGNREGA to deal with agrarian crisis', The Economic Times, 12 January, 2016, please click here to access

 

 
Social sector experts seek higher allocation for RTE, NREGA, The Hindu Business Line, 12 January, 2016, please click here to access  



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