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चर्चा में.... | विस्थापन के सबसे ज्यादा शिकार हैं आदिवासी : मंत्रालय की रिपोर्ट
विस्थापन के सबसे ज्यादा शिकार हैं आदिवासी : मंत्रालय की रिपोर्ट

विस्थापन के सबसे ज्यादा शिकार हैं आदिवासी : मंत्रालय की रिपोर्ट

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published Published on Jan 16, 2015   modified Modified on Jan 17, 2015

देश की आबादी में अनुसूचित जनजाति के लोगों की तादाद 8.6% है लेकिन विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित होने वाले लोगों कुल संख्या में अनुसूचित जनजाति के लोगों की तादाद 40 प्रतिशत है। भूमि अधिग्रहण संबंधी अध्यादेश के जारी होने के साथ उपजे विवाद के बीच आई एक नई रिपोर्ट में विस्थापन और विकास के संदर्भ में आदिवासी समुदाय के लोगों से संबंधित ऐसे कई महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भूमि अधिग्रहण, विस्थापन और जबरिया पलायन के लिहाज से देखें तो इस इन प्रक्रियाओं का सर्वाधिक शिकार आदिवासी समुदाय के लोग हुए हैं।(देखें पूरी रिपोर्ट नीचे दी गई लिंक पर)

रिपोर्ट ऑफ द हाई लेवल कमिटी ऑन सोश्यो इकॉनॉमिक, हैल्थ एंड एजुकेशनल स्टेटस् ऑफ ट्राइब्ल कम्युनिटीज ऑफ इंडिया नाम की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि तकरीबन 25 प्रतिशत आदिवासी अपने जीवन में कम से कम एक दफे विकास-परियोजनाओं के कारण विस्थापन के शिकार होते हैं। आदिवासी आबादी के पुनर्वास से संबंधित सरकार द्वारा नियुक्त एक विशेषज्ञ समिति ने कुछ दिनों पहले कहा था कि विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित होने वाले लोगों में जनजातीय समुदाय के लोगों की संख्या 47 प्रतिशत है।


 आदिवासी मामलों से संबंधित मंत्रालय द्वारा जारी हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि वामपंथी अतिवाद से गंभीर रुप से पीड़ित 9 राज्यों में से 6 राज्यों में कुछ जिले अधिसूचित श्रेणी में आते हैं। वामपंथी अतिवाद से पीड़ित कुल 83 जिलों में 42 जिलों में अधिसूचित इलाके हैं। ये इलाके  गहरी उपेक्षा और वंचना के शिकार है, गरीबी बहुत ज्यादा है, स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं का अभाव है।  इलाके के निवासी व्यापारियों, सूदखोरों के हाथो शोषित हैं और प्रशासन अक्षम-अकुशल है। विकास परियोजनाओं के कारण जनजातीय समूहों का यहां से बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ है। ये सारी बातें जनजातीय के हक की सुरक्षा के सांवैधानिक प्रावधानों और कानून के रहते हुई हैं।


आदिवासी आबादी, भू-अधिग्रहण और सामाजिक न्याय का सवाल

ग्रामीण विकास मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत भू-संसाधन विभाग की वार्षिक रपर (2007-08) के तथ्यों के आधार पर उपर्युक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि आदिवासियों के भूमि-अधिग्रहण से संबंधित कुल 5.06 लाख मामले अदालतों में दायर हुए हैं। ये मामले 9.02 लाख हैक्टेयर जमीन के हैं। दायर मामलों में कुल 2.25 लाख मामलों में फैसला आदिवासी आबादी के पक्ष में हुआ है जो कि 5 लाख एकड़ जमीन से संबंधित है। अदालत ने विभिन्न आधारों पर कुल 1.99 लाख मामलों को खारिज किया है। ये मामले 4.11 लाख एकड़ जमीन से संबंधित हैं।

 

रिपोर्ट में कहा गया है कि इतनी बड़ी संख्या में मामलों का निरस्त होना चिन्ताजनक है और ऐसा कानून में निहित कमियों अथवा राजसत्ता के उपेक्षा भरे बरताव या मिलीभगत से हुआ है।

रिपोर्ट के कुछ प्रमुख तथ्य-

• वामपंथी अतिवाद से प्रभावित नौ राज्यों में से छह राज्यों में अधिसूचित क्षेत्र(शिड्यूल्ड एरिया) हैं। कुल 83 जिलों में 42 जिले अधिसूचित क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं। ये इलाके  गहरी उपेक्षा और वंचना के शिकार है, गरीबी बहुत ज्यादा है, स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं का अभाव है।  इलाके के निवासी व्यापारियों, सूदखोरों के हाथो शोषित हैं और प्रशासन अक्षम-अकुशल है। विकास परियोजनाओं के कारण जनजातीय समूहों का यहां से बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ है। ये सारी बातें जनजातीय के हक की सुरक्षा के सांवैधानिक प्रावधानों और कानून के रहते हुई हैं।

•    देश का तकरीबन 60 फीसदी वनाच्छादित हिस्सा जनजातीय इलाकों में है। जिन 58 जिलों में वनाच्छादन 67 प्रतिशत या उससे अधिक है उनमें 51 जिले जनजातीय बहुल हैं।


•    ओडिशा, छत्तीसगढ़ और झारखंड में देश के कोयला-भंडार का 70 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है। देश के लौह-अयस्क का 80% हिस्सा, बाक्साइट का 60% तथा क्रोमाइट का तकरीबन 100% हिस्सा इन्हीं तीन राज्यों में है।


•    सेंटर फॉर साइन्स एंड एन्वायर्नमेंट स्टडी के एक अध्ययन रिच लैंड पुअर पीपल्स(2008) के मुताबिक सर्वाधिक खनिज-उत्पादन करने वाले कुल जिलों में 50 प्रतिशत जिले आदिवासी बहुल हैं। इन इलाकों में वनाच्छादन भी 28 प्रतिशत है जो कि राष्ट्रीय औसत( 20.9 प्रतिशत) से ज्यादा है।


•    विस्थापन की बड़ी वजह अनुमानतया बांधों का निर्माण है। बांधों से विस्थापित होने वाले लोगों की संख्या 2 करोड़ से 5 करोड़ के बीच है। बहरहाल इस बात पर विद्वानों के बीच सहमति है कि विस्थापित लोगों में अनुसूचित जनजाति के लोगों की संख्या 40 प्रतिशत है जबकि देश की कुल आबादी में जनजातीय समुदाय के लोगों की संख्या 8 प्रतिशत है।

•    विकास परियोजनाओं से विस्थापित होने वाले लोगों में 40 प्रतिशत तादाद जनजातीय समुदाय के लोगों की, 20 प्रतिशत तादाद अनुसूचित जाति की और 20 प्रतिशत तादाद अन्य पिछड़ी जाति श्रेणी के लोगों की है। शोधकर्ताओं ने उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया है कि लोगों को विकास परियोजनाओं के कारण ढाई करोड़ हैक्टेयर जमीन छोड़नी पड़ी है जिसमें 70 लाख हैक्टेयर वनभूमि भी शामिल है।  विस्थापित लोगों में से 25%  का पुनर्वास किया गया है जबकि विस्थापित जनजातीय समुदाय के कुल लोगों में केवल 21.16% का पुनर्वास हो पाया है। शेषf 79% का पुनर्वास बाकी है।


•    द राइट टू फेयर कंपेन्सेशन एंड ट्रान्सपेरेन्सी इन लैंड एक्वीजिशन रिहैबिलिटेशन एंड रिसेट्लमेंट एक्ट 2013 में विस्थापित लोगों के बीच पुनर्वास के लिए शेष बचे रह गये लोगों के बारे में कोई प्रावधान नहीं है।


•   भू-संसाधन विभाग की वार्षिक रपट 2007-08 के तथ्यों के अनुसार ओड़िशा में जनजातीय लोगों के भूमि-अधिग्रहण से संबंधित सर्वाधिक मामले अदालतों में दायर हैं। इन मामलों की संख्या 1.05 लाख है। मध्यप्रदेश का ऐसे मामलों के निपटारे के मामले में प्रदर्शन अत्यंत निराशाजनक है। मध्यप्रदेश में भूमि-अधिग्रहण के एक भी मामले में फैसला आदिवासी आबादी के पक्ष में नहीं हुआ है। गुजरात में अधिग्रहित जमीन से संबंधित कुल 19,322 मामले आदिवासी समुदाय के पक्ष में सुनाये गये हैं लेकिन जमीन की वास्तविक वापसी मात्र 376 मामलों में हुई है।


•    भारत सरकार ने अपने राष्ट्रीय आदिवासी नीति के प्रारुप(2006) में अनुसूचित जनजाति की संख्या 698  बतायी है। जनगणना(2011) में अनुसूचित जनजातीय समुदायों की संख्या 705 बतायी गई है।.


•   तकरीबन 80 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के लोग अर्थव्यवस्था के प्राथमिक क्षेत्र में कार्यरत हैं जबकि अर्थव्यवस्था के प्राथमिक क्षेत्र में कार्यरत सामान्य श्रेणी के लोगों की तादाद 53% है। ये सभी मुख्यतया खेती-बाड़ी करते हैं। साल 2001 में खेती-बाड़ी करने वाले आदिवासी लोगों की संख्या 68 प्रतिशत से घटकर 45 प्रतिशत रह गई थी जबकि आदिवासी समुदाय के खेतिहर मजदूरों की संख्या 20 प्रतिशत बढ़कर 2001 तक 37 प्रतिशत हो गई थी। इससे आदिवासी आबादी के बीच बढ़ती भूमिहीनता का पता चलता है और इस रुझान को 2011 की जनगणना के आंकड़े पुष्ट करते हैं।


•   अनुमानतया बीते एक दशक में तकरीबन 35 लाख आदिवासी लोगों ने खेती-बाड़ी या इससे जुड़े कामों को छोड़कर अनौपचारिक श्रम-बाजार का रुख किया है।

•   अनुसूचित जनजाति के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में लिंग-अनुपात प्रति 1000 पुरुष पर 991 महिलाओं का और शहरी क्षेत्र में प्रति हजार पुरुष पर 980 महिलाओं का है। राष्ट्रीय औसत प्रति हजार पुरुषों पर 990 महिलाओं का है।(2011 की जनगणना के अनुसार)


•   भारत की कुल आबादी में जनजातीय समुदाय के लोगों की संख्या साल 2001 में 8.2 प्रतिशत थी जो 2011 में बढ़कर 8.6 प्रतिशत हो गई है।

•   ओडिशा में सर्वाधिक अधिसूचित जनजातियां (62) हैं। इसके बाद कर्नाटक (50), महाराष्ट्र (45), मध्यप्रदेश (43) और छत्तीसगढ़ (42) का स्थान है।

•   दक्षिण भारत के राज्यों में (वैसे राज्य जहां कोई अधिसूचित क्षेत्र नहीं है) कर्नाटक में आदिवासी समदायों की संख्या कर्नाटक में सर्वाधिक (50) है। इसके बाद तमिलनाडु (36) और केरल (36) का स्थान है।

•   केंद्रशासित राज्यों में लक्षद्वीप में सर्वाधिक आदिवासी समुदाय के लोगों का आबादी में अनुपात सर्वाधिक(94.8 प्रतिशत) है। इसके बाद मिजोरम (94.4%), नगालैंड (86.5%), मेघालय (86.1%), और अरुणाचल प्रदेश (68.8%) का स्थान है। उत्तरप्रदेश में अनुसूचित जनजाति की आबादी वहां कुल आबादी में अपेक्षाकृत बहुत कम 0.56% है। इसके बाद तमिलनाडु (1.1%), बिहार (1.28%), केरल (1.45%), और उत्तराखंड (2.89%) का स्थान है।

 

उपर्युक्त कथा के विस्तार के लिए निम्नलिखित लिंक देखें

 

Report of the High Level Committee on Socio-Economic, Health and Educational Status of Tribal Communities of India (chaired by Prof. Virginius Xaxa), May 2014, Ministry of Tribal Affairs (Please click here to access)

 
As Modi Government in India Proceeds with Economic Development Agenda, New Map Tracking Land Disputes Shows Disturbing Pattern of Conflicts with Local People, Rights and Resources Initiative (RRI)and Society for Promotion of Wasteland Development (SPWD), November 25, 2014 (Please click here to access)


Amendments made in the  Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013. Source: Press Information Bureau, dated: 29 December 2014 (Please click here to access)

The Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement (Amendment) Ordinance 2014, promulgated by the President on 31 December 2014 (Please click here to access)


The Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013 (Please click here to access)


Map of Land Acquisition related disputes 2013-14 (Please click here to access)
 
 
Annual Report of the Ministry of Rural Development 2013-14 (Please click here to access) 


Govt's land law revives lost order of sarkar raj -Nitin Sethi, Business Standard, 6 January, 2015 (Please click here to access)


Clauses on land return, action against officials diluted -Nitin Sethi, Business Standard, 2 January, 2015 (Please click here to access)


Before he cleared land ordinance, President asked Government why the hurry -Maneesh Chhibber & Abantika Ghosh, The Indian Express, 2 January, 2014 (Please click here to access)
 

Forest land: Govt finalising dilution of tribal rights -Nitin Sethi, Business Standard, 1 January, 2015 (Please click here to access)


250 conflicts over land acquisition recorded in 2013 and 2014 -Nitin Sethi, Business Standard, 31 December, 2014 (Please click here to access) 
 
Image Courtesy: Himanshu Joshi

 



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