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न्यूज क्लिपिंग्स् | भुखमरी के जनतंत्र में खाद्य-सुरक्षा- अश्विनी कुमार

भुखमरी के जनतंत्र में खाद्य-सुरक्षा- अश्विनी कुमार

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published Published on Jul 13, 2013   modified Modified on Jul 13, 2013
खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने पर महीनों की दुविधा के बाद यूपीए सरकार ने आखिर अध्यादेश का रास्ता चुना. कांग्रेस महासचिव अजय माकन ने इसे लाइफ सेवर (जीवन रक्षक) व लाइफ चेंजर (जीवन बदलनेवाला) करार दिया, जबकि विपक्षी पार्टियों और नीतिगत विश्लेषकों ने इसे लागू करने के तरीके पर आपत्ति जाहिर की. यह ऐतिहासिक फैसला देश के करीब 67 फीसदी लोगों को सस्ते अनाज पाने का कानूनी हक मुहैया करायेगा.

इस कानून और अंत्योदय योजना को मिला कर ग्रामीण क्षेत्रों में 75 फीसदी और शहरी क्षेत्रों में 50 फीसदी घरों को लाभ मिलेगा. हकीकत में यह कानून कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विचार और मनमोहन सिंह सरकार के विकास की जरूरत के बीच समझौता है. सूचना का अधिकार कानून और मनरेगा से मिले चुनावी लाभ का फायदा उठा चुकी कांग्रेस समर्थित यूपीए सरकार सामाजिक योजनाओं के जरिये देश में गरीब समर्थित राजनीति की जगह पर कब्जा जमा रही है.

24 देशों के साथ, जिनमें दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, इक्वाडोर, ग्वोटेमाला शामिल है, भारत भी खाने के अधिकार को संवैधानिक बनाने वालों में शामिल हो गया. वर्ष 2011-12 में रिकार्ड तोड़ 252 मिलियन टन फसलों के उत्पादन की विडंबना के बीच भुखमरी ने अंतत: भारत के नीति-निर्माताओं का ध्यान इस ओर खींचा. 40 फीसदी खाद्यान्न बाजार में जाने, फर्जी राशन कार्ड बनने, एफसीआइ के गोदामों में अनाज सड़ने और जस्टिस वाधवा कमिटी द्वारा उचित मूल्य की निजी दुकानों को भ्रष्टाचार का केंद्र बताने के बीच खाद्य सुरक्षा कानून को भी भविष्य में देश से भुखमरी और गरीबी को खत्म करने में बाधा व असफलता का सामना करना पड़ेगा.

मॉनसून सत्र शुरू होने में महीने से भी कम समय बचा है. ऐसे में संविधान की धारा 123 के जरिये अध्यादेश कर रास्ता अपनाने और संसदीय लोकतंत्र व संधीय व्यवस्था के तौर-तरीकों का सम्मान नहीं करने पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं. विपक्षी दलों के बाधा खड़ी करनेवाले व्यवहार, सक्रिय किसान लॉबी और संसद में गरीबों के प्रति नव उदारवादियों के पूर्वाग्रह के कारण अध्यादेश जैसा असाधारण कदम उठाने के अपने तर्क हैं.

केंद्र सरकार का यह संवैधानिक दायित्व है कि इस अध्यादेश को दोनों सदन के पटल पर रखे और छह हफ्ते के अंदर पारित करवाये. इस विषय पर सदन में विपक्षी दलों, जिनमें वाम दल भी शामिल हैं, द्वारा संसदीय बहस और राज्यों के अधिकारों की अनदेखी करने पर हंगामेदार बहस होना तय है.

कुछ राज्यों, खास कर तमिलनाडु और छत्तीसगढ़, में व्यापक पीडीएस लागू है और संभावना है कि उनका खाद्य आवंटन कम हो सकता है. वे न सिर्फ राज्यों के अधिकारों का बचाव करेंगे, बल्कि खाद्य सुरक्षा कानून के व्यापक स्तर पर पहुंच की असफलता पर भी हमला करेंगे.

आंध्र प्रदेश सब्सिडी के तहत चावल मुहैया कराता है और मध्य प्रदेश ने पहले ही एक जून से गेहूं एक रुपया किलो और चावल दो रुपये किलो मुहैया कराने की घोषणा कर दी है. ओड़िशा और कर्नाटक ने भी ऐसी ही योजना की घोषणा की है. गरीबी और भुखमरी से लड़ने के लिए नीति बनाने में राज्यों की स्वायत्तता पर होनेवाली बहस में यूपीए के गेम चेंजर की वैधता हल्का होने की संभावना है.

यह कानून इस मायने में गेम चेंजर है कि मिड डे मिल, समग्र बाल विकास योजना और महिला सशक्तीकरण योजना को इससे जोड़ दिया है. इस पर गौर करें. 6 महीने से 6 साल तक आयु वर्ग के बच्चों को इस कानून के तहत उम्र के लिहाज से भोजन की गारंटी मुफ्त में स्थानीय आंगनबाड़ी के जरिये दी गयी है. 6-14 आयु वर्ग के बच्चों को रोजाना एक वक्त भोजन (स्कूल में छुट्टी को छोड़ कर) का मुफ्त प्रबंध सरकारी व सरकारी मदद से चलनेवाले स्कूलों में कक्षा 8 तक कर दिया गया है.

सभी गर्भवती और दूध पिलाने वाली मां स्थानीय आंगनबाड़ी में मुफ्त भोजन पाने की हकदार हैं. साथ ही मातृत्व लाभ 6 हजार रुपये किस्तों में मिलेगा. लैंगिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए परिवारों में सबसे बुजुर्ग महिला को मुखिया मानते हुए राशन कार्ड जारी किया जायेगा. कानून में महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को दुकान का लाइसेंस देने का भी प्रावधान है. पौष्टिक इमरजेंसी से निबटने के लिए कानून में तेल, दाल और अन्य खाद्य सामग्री को भी भविष्य में जोड़ने का वादा किया गया है.

पीडीएस पाने के योग्य घरों की पहचान राज्यों द्वारा सामाजिक और आर्थिक जाति जनगणना से की जायेगी. इसका मतलब है कि खाद्य सुरक्षा कानून अभी लागू नहीं होगा, क्योंकि हरियाणा और त्रिपुरा को छोड़ कर ज्यादातर राज्यों ने लाभार्थियों के पहचान की जनगणना नहीं की है. यह काम काफी जटिल है. यही कारण है कि 200 सबसे गरीब जिलों में समग्र पीडीएस के विचार को स्थगित करना पड़ा और इस पर खाद्य सुरक्षा के एनएसी के वास्तविक ड्राफ्ट में चर्चा की गयी थी. बीपीएल वास्तव में अभावग्रस्तता की रेखा है और इससे बड़ी संख्या में भूखे, कुपोषित और खाद्य असुरक्षा वाले घर पीडीएस के दायरे से बाहर हो गये. ऐसे में समग्र पीडीएस के विचार को छोड़ना दुर्भाग्यपूर्ण है.

आरटीआइ से प्रेरित होकर और मनरेगा में हुए भ्रष्टाचार के खुलासे से सबक लेते हुए खाद्य सुरक्षा कानून में शिकायतों के लिए दो स्तरीय व्यवस्था की गयी है, इसमें राज्य खाद्य कमीशन व जिला स्तरीय शिकायत निवारण अधिकारी शामिल हैं.

मनरेगा में सोशल ऑडिट के प्रावधान के हालत को देखते हुए इसकी शिकायत निवारण व्यवस्था एक बड़ी चुनौती है. लाभार्थियों को खाद्य अधिकार के बदले कैश ट्रांसफर व फूड कूपन देना भी इसमें शामिल किया गया है. सर्वे व अध्ययन इशारा करते हैं कि जिन इलाकों में बेहतर पीडीएस है, वहां कैश ट्रांसफर के प्रति अनिच्छा मजबूत है. बिहार और यूपी, जहां पीडीएस अक्षम व भ्रष्ट है, में कैश ट्रांसफर और कूपन के पक्ष में समर्थन मजबूत है.

इस योजना में सालाना 62 मिलियन टन खाद्य पदार्थ के वितरण से सरकार का खाद्य सब्सिडी बजट 1,24,724 करोड़ रुपये बढ़ जायेगा. बजट 2013-14 में सब्सिडी 90 हजार करोड़ रुपये थी और खाद्य सुरक्षा के लिए 10 हजार करोड़ रु अतिरिक्त आवंटन किया गया था. नवउदारवादी और वित्तीय रुढ़ीवादी विकास कम होने और चुनावी साल में फिजूलखर्ची को लेकर हो हल्ला मचा रहे हैं, लेकिन रिसर्च से पता चलता है इस कानून के सही क्रियान्वयन से बीपीएल परिवारों का जरूरी खाद्य पदार्थो पर खर्च कम होगा, जिससे वे शिक्षा, स्वास्थ्य और छोटे कारोबार पर खर्च करेंगे. प्रति बीपीएल परिवार साल में 4400 रुपये की बचत होगी.


अतिरिक्त बचत और गरीबों द्वारा खपत व निवेश न सिर्फ अच्छा अर्थशास्त्र है, बल्कि खाद्य असुरक्षित और माओवाद से ग्रस्त क्षेत्रों के लिए शांति का लाभ हासिल करने का वादा भी करता है. ग्रामीण मजदूरी बढ़ने की अच्छी खबर से लेकर खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने तक में 2014 के आम चुनाव के लिए छिपा राजनीतिक संदेश यह है कि भुखमरी के जनतंत्र में ‘नमो' के सामने कठिन चुनौती है.


http://www.prabhatkhabar.com/news/1518-story.html


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