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न्यूज क्लिपिंग्स् | अन्न की बर्बादी और भूख-- रविशंकर

अन्न की बर्बादी और भूख-- रविशंकर

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published Published on Nov 15, 2015   modified Modified on Nov 15, 2015
हर साल देश में करीब पचास हजार करोड़ रुपए का अनाज बर्बाद हो जाता है। एक ऐसे देश में जहां करोड़ों की आबादी को दो जून ठीक से खाना नहीं नसीब होता, वहां इतनी मात्रा में अनाजों की बर्बादी किस तरह की कहानी कहती है? इसकी पड़ताल कर रहे हैं रविशंकर।
यह विडंबना नहीं, उसकी पराकाष्ठा है कि सरकार किसानों से खरीदे गए अनाज को खुले में छोड़कर अपना कर्तव्य पूरा समझ लेती है। फिर अनाज के खराब होने के जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू होती है और यह जांच तब तक चलती रहती है जब तक वह सेवामुक्त होकर अपने घर नहीं पहुंच जाता है। जबकि संयुक्त राष्ट्र की भूख संबंधी सालाना रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में सबसे ज्यादा भुखमरी के शिकार भारतीय है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एएफओ) ने अपनी रपट ‘द स्टेट ऑफ फूड इनसिक्युरिटी इन द वर्ल्ड 2015' में यह बात कही है। यह विचारणीय और चिंतनीय है कि खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर होकर भी हमारे देश में भूख से जूझ रहे लोगों की संख्या चीन से भी ज्यादा है। इसकी एक बड़ी वजह हर स्तर पर होने वाली अन्न की बर्बादी है क्योंकि हमारे यहां हर साल करोड़ों टन अनाज बर्बाद होता है।
जी हां, संयुक्त राष्ट्र की फूड एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक हर साल दुनियाभर में करीब 1300 करोड़ कुंटल खाना किसी न किसी कारण बर्बाद हो जाता है। अमीर देशों में ग्राहक उतना खाना बर्बाद कर देते हैं जितना उप-सहारा अफ्रीका में उत्पादन होता है। स्थिति यह है कि विश्व में आठ में से एक व्यक्ति के पास पर्याप्त खाना नहीं है। जबकि चार-पांच साल पहले अनाज की बढ़ी कीमतों के कारण बारह देशों में दंगे हो गए थे और संयुक्त राष्ट्र को खाद्यान्न संकट पर सम्मेलन बुलाना पड़ा था। बहरहाल, किसी भी देश में जब तक अन्न के उत्पादन, भंडारण और वितरण की उचित व्यवस्था नहीं होगी, तब तक देश से कुपोषण और भुखमरी को खत्म नहीं किया जा सकता है और न ही अन्न का भंडारण सही तरीके से किया जा सकता है। जबकि सरकारी आंकड़े यह दावा करते नहीं थकते हैं कि हम खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो गए हैं। सरकारी दावा को एक हद तक सही माना जा सकता है। लेकिन अन्न के भंडारण और वितरण का अवैज्ञानिक तरीका जहां एक तरफ अन्न के अभाव में भूख से मौत का तांडव करा रहा है, पर दूसरी तरफ हजारों टन अनाज उचित रखरखाव के अभाव में बर्बाद हो चुका है और हो रहा है।
पिछले कुछ सालों में सरकारी नीतियों ने अन्न उत्पादन और वितरण पर ऐसी नीति अपनाई है कि देश के सामने खाद्यान्न सुरक्षा संकट में पड़ गया है। इस समय दुनिया भर में अस्सी करोड़ ऐसे लोग हैं, जिन्हें दोनों जून की रोटी मयस्सर नहीं होती। इन में से करीब चालीस करोड़ लोग भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हैं और यह तब हो रहा है, जब इन देशों में खाद्यान्नों के अतिरिक्त भंडार भी भरे पड़े हैं। वहीं दूसरी तरफ विश्व की आबादी 2050 तक नौ अरब होने का अनुमान लगाया जा रहा है और इसमें करीब
अस्सी फीसद लोग विकासशील देशों में रहेंगे। ऐसे में किस तरह खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, यह एक बड़ा प्रश्न है। दुनिया में एक तरफ तो ऐसे लोग हैं, जिनके घर में खाना खूब बर्बाद होता है और फेंक दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जिन्हें एक समय का भोजन भी नहीं मिल पाता। नतीजतन,विश्वभर में में प्रतिदिन चौबीस हजार लोग किसी जानलेवा बीमारी से नहीं, बल्कि भूख से मरते हैं। इस संख्या का एक तिहाई हिस्सा भारत के हिस्से में आता है। भूख से मरने वाले इन चौबीस हजार में से अठारह हजार बच्चे हैं। इसमें छह हजार बच्चे भारतीय हैं। लेकिन अफसोस कि पिछले अड़सठ सालों में देश भर में इस बारे में कोई चिंता नहीं की गई। क्या संसद में इस संबंध में कोई बहस हुई?
ऐसा नहीं कि गरीबों को सस्ते दर पर अनाज उपलब्ध कराने के लिए हमारी सरकार के पास योजनाओं की कमी नहीं है। लेकिन उसका सही ढंग से क्रियान्वयन न हो पाने के कारण हर योजना अपने लक्ष्य तक पहुंचने के पहले ही दम तोड़ देती है। 1997 में अपनाई गई सार्वजनिक वितरण प्रणाली का मकसद यह था कि गरीबों को सस्ते मूल्य पर खाद्यान्न उपलब्ध करा कर समाज में आय के अंतर को कम किया जाए। लेकिन सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने जिस मूल्य स्थिरता को पाना चाहा था, उसमें सफलता नहीं मिलीं और निर्धनों को सब्सिडी प्रदान करने का मकसद भी पूरा नहीं हो सका। वहीं पिछले कुछ वर्षों में खपत की तुलना में भारी स्टॉक एकत्र हो गया है।
भंडारण स्थान की कमी के कारण हजारों टन अन्न खराब हो रहा है। अभी तक भारत सरकार की अन्न भंडारण की नीति बीस वर्ष को ध्यान में रखकर बनाई जाती रही है। इस भंडारण नीति को जब तक दीर्घकालिक नहीं किया जाएगा। तब तक अन्न भंडारण को सही तरीके से अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सकता है। इसके साथ अन्न भंडारण को जब तक देश के निर्धन क्षेत्रों में भुखमरी को समाप्त करने की योजना से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक अन्न उत्पादन के लक्ष्य नहीं हासिल किए जा सकते। कृषि मंत्रालय का कहना है कि पिछले दशक में जनसंख्या वृद्धि दर की तुलना में देश में अन्न की मांग कम बढ़ी है। अब यह मांग उत्पादन से कम है। यानी भारत अब अन्न की कमी से ऊपर उठकर खाद्यान्न के मामले में सरप्लस देश बन गया है। देश में इस समय विश्व के कुल खाद्यान्न का करीब पंद्रह फीसद खपत करता है। लेकिन आज भी हमारे देश में अनाज का प्रति व्यक्ति वितरण बहुत कम है।
बहरहाल, खुद को उभरती हुई आर्थिक शक्ति मानकर गर्व करने वाले भारत के लिए यह शर्मनाक है। यह सरकार के उन तमाम दावों को भी नकार देती है, जो विकास का दावा करते हैं। हालांकि, 2000 में संयुक्त राष्ट्र के सभी 192 सदस्य देशों ने आठ सहस्राब्दी विकास लक्ष्य निर्धारित किए थे जिन्हें 2015 तक हासिल किया जाना है। 2011 की प्रगति रिपोर्ट दिखाती हैं कि अत्यधिक गरीबी और भुखमरी को खत्म करने से पहले लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में मिलेजुले नतीजे मिले हैं। पहले विकास लक्ष्य के तहत उन लोगों की संख्या में पचास प्रतिशत की कमी लाई जानी है जो कुपोषण का शिकार हैं। लेकिन आंकड़े दिखाते हैं कि ऐसे लोगों का अनुपात 1990 में बीस प्रतिशत के मुकाबले घट कर सिर्फ 16 प्रतिशत ही हो पाया है। भारत की हालत पहले से भले ही बेहतर हुई हो लेकिन कई पड़ोसी मुल्कों से बदतर है।
एक ओर हमारे और आपके घर में रोज सुबह रात का बचा हुआ खाना बासी समझकर फेंक दिया जाता है तो वहीं दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें एक वक्त का खाना तक नसीब नहीं होता और वह भूख से मर रहे हैं। कमोबेश हर विकसित और विकासशील देश की यही कहानी है। इतना ही नहीं दुनिया में पैदा किए जाने वाले खाद्य पदार्थ में से करीब आधा हर साल बिना खाए सड़ जाता है। गरीब देशों में इनकी बड़ी मात्रा खेतों के नजदीक ही बर्बाद हो जाती है। अमीर देश भी अपने कुल खाद्यान्न उत्पादन का करीब आधा बर्बाद कर देते हैं लेकिन इनके तरीके जरा हटकर होते हैं। दुनिया में आज भी करोड़ों की संख्या में ऐसे लोग हैं, जिनके लिए पेट भर भोजन पाना एक चुनौती है। वहीं दूसरी तरफ ऐसा भी है कि दुनिया भर में पैदा होने वाला एक तिहाई अन्न बर्बाद हो जाता है, जिसकी कीमत लगभग 47 लाख करोड़ है जो कि स्विटजरलैंड के सकल घरेलू उत्पाद के बराबर है। माना जाता है कि विकसित देश अन्न को बर्बाद कर रहे हैं, जबकि विकासशील देशों में इसके रखरखाव का समुचित प्रबंध न होने के कारण ऐसा हो रहा है।
अफसोस तो यह कि दुनिया भर में निर्यात करने वाले देश में ही तीस करोड़ गरीब जनता भूखी सोती है। फिर हम इस खुशफहमी में कैसे जी सकते हैं कि भारत कृषि प्रधान देश है, जो सबका पेट भरता है। अगर वाकई ऐसा है तो हमारा देश भूखा क्यों हैं? आज भी छत्तीसगढ़, बुंदेलखंड, ओड़िशा, झारखंड और बिहार में भुखमरी का प्रतिशत ज्यादा क्यों बना हुआ है? एक तरफ देश में भुखमरी का खतरा मंडरा रहा है वहीं सरकारी लापरवाही के चलते
लाखों टन अनाज बारिश की भेंट चढ़ रहा है। महंगाई से आम आदमी परेशान है, खाद्य पदार्थों के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन सरकार को यह गवारा नहीं कि जब उसके पास इफरात में अनाज का भंडार है तो वह उसे खुले बाजार में क्यों नहीं जारी कर देती। भले ही गोदामों में अनाज चूहे खाते रहें, अनाज पानी में पड़ा सड़ता रहे, लेकिन मजाल है कि वह अनाज भूख से तिल-तिल मरती जनता तक पहुंच जाए। सुप्रीमकोर्ट ने ठीक ही कहा था कि अगर सरकार के पास इतना अनाज रखने का इंतजाम नहीं है तो वह उसे जरूरतमंदों को क्यों नहीं बांट देती।
अनाजों के सड़ाने का एक अर्थशास्त्र यह भी देखा गया है कि 13.50 रुपए प्रति किलो के हिसाब से खरीदे गए गेहूं को सड़ाकर 6.75 प्रति किलो की दर से शराब कंपनियों को बेच दिया जाता है। यानी जितना अधिक अन्न सड़ेगा, शराब कंपनियों को उतना ही अधिक लाभ होगा। दरअसल देखा जाए तो अनाज सड़ाने या नष्ट करने का खेल वैश्विक स्तर पर खेला जा रहा है। इंस्टीट्यूशन आॅफ मैकेनिकल इंजीनियर्स की वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में जितना अनाज पैदा होता है, उसमें से करीब-करीब आधा अनाज ही मनुष्यों के काम आ पाता है। अमेरिका और यूरोप में जितना अन्न बर्बाद किया जाता है, उससे बाकी दुनिया की भूख मिटाई जा सकती है। अमेरिका अपने उत्पादित अन्न का चालीस प्रतिशत फेंक देता है और ब्रिटेन में साल भर में 83 लाख टन अन्न कूड़े में डाल दिया जाता है। ऐसा नहीं है कि अमेरिका में भूखे नहीं हैं।
ऐसा नहीं है कि भारत में खाद्य भंडारण के लिए कोई कानून नहीं है। 1979 में खाद्यान्न बचाओ कार्यक्रम शुरू किया गया था। इसके तहत किसानों में जागरूकता पैदा करने और उन्हें सस्ते दामों पर भंडारण के लिए टंकियां उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन इसके बावजूद आज भी लाखों टन अनाज बर्बाद होता है। यही वजह है कि देश के दस लोगों के पास जितनी संपत्ति बताई जाती है, उतनी निचले तबके के दस करोड़ लोगों के पास कुल मिलाकर नहीं है। करोड़ों लोगों को दिन शुरू करने के साथ ही यह सोचना पड़ता है कि आज पूरे दिन पेट भरने की व्यवस्था कैसे होगी। जाहिर है, अभी हम अन्न की बबार्दी के अप्रत्यक्ष परिणामों से वाकिफ नहीं हैं।
इसका बड़ा खामियाजा हमारी आने वाली पीढ़ी को भुगतना पड़ेगा। अगले 37 वर्षों में हमारी जनसंख्या दो अरब और बढ़ने वाली है। तब हम सबको अन्न कैसे उपलब्ध करा पाएंगे? कृषि क्षेत्र लगातार सरकारी उपेक्षा का शिकार हो रहा है। आज देश की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी मात्र चौदह फीसद है और इस पर 55 फीसद कामगारों की आजीविका चलती है। आज कृषि क्षेत्र कभी एक फीसद, दो फीसद या फिर ऋणात्मक दर से वृद्धि कर रहा है। आजादी के 68 साल बीत जाने के बाद आज भी साठ फीसद खेती वर्षा के सहारे हो रही है। ऐसे में किस तरह खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित किया जाए, यह एक बड़ा प्रश्न है। भूख की वैश्विक समस्या को तभी हल किया जा सकता है, जब उत्पादन बढ़ाया जाए। साथ ही उससे जुड़े अन्य पहलुओं पर भी समान रूप से नजर रखी जाए। खाद्यान्न सुरक्षा तभी संभव है, जब सभी लोगों को हर समय, पर्याप्त सुरक्षित और पोषक तत्त्वों से युक्त खाद्यान्न मिले, जो उनकी आहार संबंधी आवश्यकताओं को पूरा कर सके। साथ ही कुपोषण का रिश्ता गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी आदि से भी है। इसलिए कई मोर्चों पर एक साथ मजबूत इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करना होगा।
खैर पिछले दिनों केंद्र सरकार का बहु प्रतीक्षित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक-2013 संसद के दोनों सदनों में पारित हो चुका है। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य देश की दो तिहाई अबादी को भारी सब्सिडी वाला खाद्यान्न अधिकार के तौर पर प्रदान करना है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक-2013 के तहत लाभान्वित परिवारों में से प्रत्येक व्यक्ति के लिए तीन रुपए से एक रुपए प्रति किलोग्राम की दर से प्रति माह पांच किलो चावल, गेहूं या मोटे अनाज की गारंटी होनी है। इस विधेयक में देश की दो-तिहाई आबादी को सस्ती दर पर अनाज मुहैया कराने का प्रावधान है।
भारत की यह खाद्य सुरक्षा योजना भूख से लड़ाई के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा कार्यक्रम है। लेकिन यह कार्यक्रम कितना सफल हो पाएगा। यह आने वाला समय तय करेगा। क्योंकि अपने खून पसीने की मेहनत से देश का पेट भरने वाला अन्नदाता जब स्वयं का ही जीवन समाप्त करने में जुट जाए, तो यह किसी भी राष्ट्र को शर्मसार करने के लिए काफी हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा 2014 की जारी रिपोर्ट बयां करती है कि भारत में हर पौन घंटे के अंतराल में देश का एक किसान आत्महत्या कर लेता है। 2014 में देश में 12,360 किसानों ने आत्महत्या की है। देश में केंद्र सहित राज्यों की सरकारें जहां प्रतिवर्ष कृषि बजट बढ़ाने की बाते करती हैं, ठीक इसके विपरीत किसानों की आत्महत्याओं का आंकड़ा प्रतिवर्ष बढ़ता चला जा रहा है।
जाहिर है, किसानों का संकट सिर्फ उनका अपना संकट ही नहीं है। यह सवाल देश की खाद्य सुरक्षा से भी ताल्लुक रखता है। सवाल उठता है कि तमाम कोशिशों के बावजूद खाद्यान्न उत्पादन जरूरत के अनुपात में बढ़ने के बजाय घट क्यों रहा है? इसकी प्रत्यक्ष वजह मौजूदा नीतियों में निहित खामियां ही दिखती हैं। औद्योगिक विकास और विदेशी पूंजी निवेश की चिंता में दुबली होती हमारी सरकारों ने किसानों की लगातार अनदेखी की है। शहरीकरण और औद्योगीकरण के चलते खेती का रकबा लगातार घटता जा रहा है। खेती घाटे का सौदा बन गई है और किसान कर्ज के कुचक्र में फंस गया है।
नतीजतन खेती से उसका मोहभंग होता जा रहा है। कहा जा सकता है कि हमारी खेती और किसानों की मौजूदा हालत देश की कृषि नीति की ही नहीं, बल्कि विकास नीति की भी केंद्रीय विफलता है। इस विफलता के अपराधी हमारे वे योजनाकार या नीति-नियंता हैं, जिन्हें सामाजिक और आर्थिक समता का दर्शन खटकता है, बकवास लगता है। सवाल यही है कि सबके के लिए अच्छे दिन लाने का वायदा कर सत्ता में आए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमारी खेती और किसानों के दुर्दिनों को खत्म करने के लिए क्या इस दोषपूर्ण विकास नीति को बदलने का कौशल और साहस दिखा पाएंगे?

 


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