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न्यूज क्लिपिंग्स् | ऊंची विकास दर के शहसवार - सुषमा रामचंद्रन

ऊंची विकास दर के शहसवार - सुषमा रामचंद्रन

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published Published on Jun 11, 2016   modified Modified on Jun 11, 2016
यकीनन यह बेहद खुशी की बात है कि भारत आज दुनिया की सबसे तेज विकास दर वाला देश बन गया है। हाल ही में जारी किए गए नवीनतम अधिकृत डाटा के अनुसार वित्त-वर्ष 2015-16 में भारत की विकास दर 7.6 प्रतिशत थी। यह चीन की 6.7 प्रतिशत विकास दर से बहुत आगे है। इतना ही नहीं, वित्त-वर्ष की पिछली तिमाही में तो 7.9 प्रतिशत से भी अधिक की विकास दर दर्ज की गई। इसके यह भी मायने हैं कि आने वाले समय में भारत 8 से 9 प्रतिशत तक की विकास दर भी अर्जित कर सकता है, जो कि सुस्ती से जूझ रही विश्व-आर्थिकी के परिप्रेक्ष्य में एक अद्भुत परिघटना होगी। यह इसलिए रोमांचक है कि एक बेहतर विकास दर में किसी भी देश को गरीबी के चंगुल से बाहर निकाल लाने की क्षमता होती है। और भारत जैसे देश के लिए इसका बेहद महत्व है।

बहरहाल, अच्छी विकास दर के बावजूद देश में आर्थिक विषमता के कारण उपजी जो समस्याएं हैं, उन्हें आज नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्योंकि समाज में व्याप्त खाइयों के कारण ही आर्थिक विकास के समुचित लाभ सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाते और अमीरों के और अमीर होते चले जाने और गरीबों के गरीब ही बने रहने की परिघटना के रूप में सामने आते हैं। और भारत में तो सामाजिक संरचना में अनेक स्तरों पर विषमताएं हैं। एक तरफ अमीर-गरीब का भेद है तो दूसरी तरफ शहरी-ग्रामीण का भी भेद है। विकास की चमचमाहट जहां शहरों में देखी जा सकती है, वहीं गांव आज भी अंधकार में डूबे हुए हैं। वे भीषण अभावों से जूझ रहे हैं। हालांकि पहले बीमारू कहलाने वाले राज्य आज उतने बदहाल नहीं हैं, लेकिन खुशहाली का सपना अभी भी दूर बना हुआ है। बिहार आज भी गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों की तुलना में आर्थिक विकास की दौड़ में बहुत पिछड़ा हुआ है। एक तीसरा विभाजन डिजिटल डिवाइड का भी है, जिसमें एक तरफ वे लोग है, जिनके पास इंटरनेट तक पहुंच और उसके उपयोग की कुशलता है, वहीं दूसरी तरफ सूचना क्रांति से आज भी दूर बने हुए लोग हैं, जो समय की दौड़ में पहली कोटि के लोगों से काफी पिछड़ गए हैं।

यही कारण है कि आज जहां हम दुनिया में सबसे तेजी से विकास करने वाला देश बन गए हैं, वहीं दूसरी तरफ गंभीर चुनौतियां अभी तक हमारे सामने कायम हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने कहा था कि हम आज भी अंधों में काना राजा के समान ही हैं। राजन का दृष्टिकोण यही है (जो कि उनकी मौद्रिक नीति में भी झलकता है) कि अतिउत्साहित ना हुआ जाए और चुनौतियों पर नजर कायम रखी जाए। शायद इसी तरह से दीर्घकालीन सफलताएं अर्जित की जा सकती है, जिनमें गरीबी हटाना सबसे प्रमुख है।

दूसरी तरफ ऊंची विकास दर का महत्व भी तभी होगा, जब हम उसकी मदद से रोजगार निर्माण में कामयाब हो सकें। अगर बेरोजगारी के आंकड़ों पर नजर डालें तो अभी तक तो ऐसा हो नहीं सका है। रिपोर्ट्स के मुताबिक वर्ष 2015 में 1 लाख 35 हजार नए रोजगार सृजित किए गए थे, जो कि वर्ष 2014 में सृजित हुए 4 लाख 21 हजार रोजगारों की तुलना में बेहद कम है। जबकि वर्ष 2014 में आधे समय यूपीए का राज था। इसके उलट वर्ष 2015 में अक्टूबर से दिसंबर के दौरान सरकार द्वारा निर्यात में कटौती किए जाने से कोई 20 हजार लोगों को नौकरियां गंवाना पड़ीं। जबकि चुनौती इतनी बड़ी है कि आकलनों के मुताबिक हर साल कोई 1 करोड़ 20 लाख लोग बेरोजगारों की सूची में नए जुड़ जाते हैं।

आर्थिक विश्लेषक इस प्रकार की स्थिति को जॉबलेस ग्रोथ की संज्ञा देते हैं, जिसमें विकास दर के आंकड़ों के साथ ही बेरोजगारों की तादाद भी बढ़ती जाती है। लेकिन हालात निराशाजनक नहीं हैं। मसलन, कुछ अन्य डाटा बताते हैं कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में हाल के समय में नाटकीय बढ़ोतरी हुई है। और दूसरा यह कि निर्माण क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसका मतलब यह है कि निकट भविष्य में नौकरियों का विस्फोट होने वाला है। हम यह मान सकते हैं विदेशी निवेश की पूंजी से संचालित होने वाली अनेक परियोजनाएं अगले साल तक प्रभावशील हो जाएंगी। भारत में निर्माण क्षेत्र एक लंबे समय से पिछड़ रहा है, लेकिन मेक इन इंडिया परियोजना पर सरकार द्वारा जोर दिए जाने और विदेशी निवेशकों द्वारा दिलचस्पी दिखाई जाने के कारण मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर में नए उत्साह का संचार हुआ है। हम मान सकते हैं कि इसके बाद अर्थव्यवस्था के इस लेबर इंटेंसिव सेक्टर रोजगार के अनेक अवसर जल्द ही सृजित होने जा रहे हैं।

लेकिन बेरोजगारी की स्थिति इसलिए निर्मित हो रही है कि रोजगार निर्माण के क्षेत्र में सेवा क्षेत्र अभी तक वैसा प्रदर्शन नहीं कर पाया है, जितनी कि उससे अपेक्षा की जा रही थी। यहां तक कि ई-कॉमर्स सेक्टर में भी गिरावट दर्ज की जा रही है और फ्लिपकार्ट जैसी इस क्षेत्र की कद्दावर कंपनी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। इस कारण उसे आईआईएम से मैनेजमेंट ग्रेजुएट्स की नियुक्तियों पर भी रोक लगाना पड़ी है। यही हालत अन्य ई-कॉमर्स कंपनियों की भी है, जिनके लिए अनेक प्रबंधन विद्यार्थियों द्वारा इंटरव्यू दिए गए थे और उनका चयन भी कर लिया गया था, लेकिन अभी तक उनके द्वारा ज्वॉइन नहीं किया गया है। माना जा रहा है कि स्टार्टअप इंडिया योजना के फलस्वरूप ई-कॉमर्स के क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव आने वाला है, या इसकी प्रक्रिुरू हो चुकी है।

लेकिन सबसे अच्छी बात यह है कि अर्थव्यवस्था महंगाई के बोझ से मुक्त होती जा रही है और कृषि पैदावार भी बेहतर प्राप्त हो रही है। एक अच्छा मानसून इस पूरी तस्वीर को बदलकर रख देगा और बहुतों को उम्मीद है कि मौसम वैज्ञानिकों की एक औसत से बेहतर मानसून की भविष्यवाणी सही साबित हो। भारत भले ही दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन गया हो, लेकिन आज भी उसकी आर्थिकी मानसून पर जरूरत से ज्यादा निर्भर बनी हुई है और अब योजनाकारों के लिए सबसे अधिक सोचने वाली बात यही होनी चाहिए कि मानसून पर इस अत्यधिक निर्भरता से कैसे मुक्त हुआ जाए।

इस परिप्रेक्ष्य में एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अर्थव्यवस्था की इस तेजी से हमारी वैश्विक हैसियत में हमें कितना फायदा मिलेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका सहित अन्य देशों की यात्रा के दौरान हमने देख ही लिया कि दुनिया में भारत का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा है, लेकिन एक वैश्विक महाशक्ति बनने के लिए हमें अब भी अनेक वर्षों तक आर्थिक विकास को कायम रखना होगा और एक पुख्ता बुनियादी ढांचा तैयार करना होगा। जो भी हो, इस वक्त हालात मायूसी के बजाय उम्मीदें पैदा करने वाले अधिक हैं।

(लेखिका आर्थिक मामलों की वरिष्ठ विश्लेषक हैं। ये उनके निजी विचार हैं


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