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न्यूज क्लिपिंग्स् | कटते जंगल किसका मंगल- मुस्कान

कटते जंगल किसका मंगल- मुस्कान

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published Published on Feb 12, 2014   modified Modified on Feb 12, 2014
जनसत्ता 8 फरवरी, 2014 : विकास के पूंजीवादी-नवउदारवादी मॉडल की कुछ खास तरह की जरूरतें होती हैं। या कहें कि यह मॉडल आर्थिक संवृद्धि के एवज में कुछ खास बलिदानों की मांग करता है। हम देखते हैं कि भारत सरीखे अधिकतर विकासशील देश इन बलिदानों के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। अब सवाल है कि विकास की प्रचलित अवधारणा किन बलिदानों की मांग करती है? और ये बलि के बकरे कौन हैं?

अपने जल-जंगल-जमीन के अधिकारों के लिए जूझते आदिवासी समाज की ओर हम देखें तो इस प्रश्न का जवाब स्वत: मिल जाता है। आदिवासी ही क्यों, अपने भरण-पोषण का एकमात्र सहारा, अपनी उपजाऊ जमीन को ‘सेज’ के तहत छिनते देखता किसान भी विकास के नाम पर ही ठगा जाता है। तीसरे नंबर पर पर्यावरण को रख लीजिए। पर्यावरण रूपी बकरा तो कटते हुए आवाज भी नहीं करता। आर्थिक विकास, सेज और औद्योगिक इकाइयों के आसपास होने वाले शहरीकरण के लिए जंगलों से पेड़ों की अंधाधुंध कटाई किससे छिपी है? सरकार आर्थिक सुधारों के दूसरे चरण के मद््देनजर निर्वनीकरण की ‘जरूरत’ को और महिमामंडित कर रही है।

हाल ही में फिक्की के मंच से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय पर निशाना साधते हुए कहा कि पर्यावरण मंत्रालय की तरफ से परियोजनाओं को मंजूरी देने में देरी के कारण विकास का मार्ग अवरुद्ध हो रहा है। इसके तुरंत बाद जयंती नटराजन ने पर्यावरण एवं वन मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया, या उनसेइस्तीफा ले लिया गया। और फिर पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली ने पर्यावरण मंत्रालय का कार्यभार संभाला। ताजा स्थिति यह है कि विकास संबंधी परियोजनाओं की खातिर पर्यावरणीय मंजूरी नीति को नरम बनाने की कवायद मंत्रालय के भीतर चल रही है। मोइली की देखरेख में मंत्रालय ने मंजूरी के लिए नई नीति का मसविदा भी तैयार कर लिया है। मसविदे का सार यह है कि मंजूरी की प्रक्रिया जल्दी-जल्दी निपटाई जाए।

मोइली का कहना है कि परियोजनाओं को पर्यावरणीय स्वीकृति मिलने में देरी इसलिए होती है क्योंकि इससे संबंधित नियम बहुत जटिल हैं। परिणामस्वरूप उद्योग जगत शिकायत करता रहा है कि पर्यावरणीय मंजूरियों में देरी के कारण उनकी परियोजनाएं बाधित हो रही हैं और इससे आर्थिक विकास प्रभावित हो रहा है। पर यह उद्योग जगत की हमेशा की रट है। सच तो यह है कि उन्हें पर्यावरण मंजूरियां पाने में परेशानी तब भी नहीं होती थी जब मंत्रालय की कमान अन्य हाथों में थी। पर्यावरणीय मंजूरी पाने वाली परियोजनाओं की तुलना में अस्वीकृत प्रस्तावों का अनुपात केवल ढाई फीसद रहा है।

मनमोहन सिंह सरकार को दस साल हो रहे हैं। इस एक दशक में 2.43 लाख हेक्टेयर वनक्षेत्र उद्योगों और विकास परियोजनाओं को सौंप दिए गए। इसके अलावा, 2004 से 2013 के बीच तेल और खनन की संभावनाओं का पता लगाने के लिए 1.64 लाख हेक्टेयर वनभूमि दे दी गई। ये आंकड़े खुद पर्यावरण मंत्रालय के हैं। यह भी गौरतलब है कि केंद्र और राज्य सरकारों के पास जो प्रस्ताव लंबित हैं वे इन दोनों आंकड़ों के योग से भी ज्यादा वनभूमि की मांग करते हैं।

वीरप्पा मोइली के पर्यावरण एवं वन मंत्री बनने के बाद मंत्रालय में अटकी फाइलें फटाफट निपटाई जा रही हैं। मोइली ने आते ही पर्यावरणीय मंजूरी को आसान बनाने के लिए नीतियों में जो फेरबदल शुरू किए हैं उनका त्वरित फायदा कॉरपोरेट सेक्टर को होने वाला है। मंत्रालय की स्वीकृति के लिए लंबे समय से अटकी उनकी फाइलें फटाफट निकलने लगी हैं ताकि औद्योगिक विकास और आर्थिक विकास का धीमा पड़ा रथ तेज भाग सके।

मगर यहां अहम सवाल यह है कि देश के आर्थिक विकास की गति धीमी होने की चिंता में दुबले होने वाले हमारे उद्योगपति कभी पर्यावरण और आदिवासी हितों के लिए फिक्रमंद क्यों नहीं दिखते? आर्थिक विकास की बात करते समय उन्होंने हर बार अपने-आपको पर्यावरण, किसान और आदिवासी हितों का विरोधी ही साबित किया है।

ओड़िशा की वेदांता और पॉस्को परियोजना हो या ऐसी ही और परियोजनाएं, हालिया अतीत में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने जब इन पर रोक लगाई तो देश के उद्योगपतियों ने इसे देश के आर्थिक विकास के लिए धक्का करार दिया। पर्यावरण और आदिवासियों के हित इनके लिए विचारणीय क्यों नहीं हैं? क्या देश के पर्यावरण मंत्री को हिम्मत करके उनसे यह सवाल नहीं पूछना चाहिए? एक अनबोला जवाब तो यही है कि घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खाएगा क्या? लेकिन लोकतंत्र को तो इस घास की भी चिंता करनी है। क्या सरकार इस घास को कुचलते हुए घोड़े की सवारी करना चाहती है?

पिछले महीने वीरप्पा मोइली के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय संभालने के बाद से अब तक मंत्रालय द्वारा डेढ़ लाख करोड़ की परियोजनाओं को तीव्र गति से मंजूरी दी गई है, जिनमें बारह अरब डॉलर की इस्पात संयत्र वाली पॉस्को परियोजना भी शामिल है।

यहां तक कि मंत्रालय ने पांच मेगावाट क्षमता से कम की ताप विद्युत परियोजनाओं, सूक्ष्म खनिज और नदी के पास बालू उत्खनन से संबंधित परियोजनाओं के मामले में अनिवार्य पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की जरूरत को भी फालतू बताते हुए उसकी आवश्यकता खत्म कर दी है। साथ

ही इन परियोजनाओं के लिए जनसुनवाई से भी छूट दे दी गई है, जिसके तहत ग्रामसभा के माध्यम से स्थानीय लोग सामूहिक रूप से अपनी सहमति या असहमति व्यक्त करते हैं। ये ताजा उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि स्वयं पर्यावरण मंत्री को पर्यावरण की कितनी चिंता है!

सरकार की दलील है कि उद्योगों और आर्थिक विकास के लिए वनभूमि का उपयोग करने के लिए पर्यावरणीय अनुमति मिलने में बड़ी दिक्कत होती है। साथ ही वन संरक्षण कानून और सुप्रीम कोर्ट के समय-समय पर आए निर्देश काफी कठोर हैं और इनसे ‘विकास’ का मार्ग अवरुद्ध हो रहा है। सरकार का यह तर्क मुख्य रूप से दो सवाल खड़े करता है- पहला, पर्यावरणीय विनाश की कीमत पर किया जाने वाला आर्थिक विकास कितना वांछित है? और दूसरा, क्या वन संरक्षण कानून और सुप्रीम कोर्ट विकास-विरोधी हैं? क्या पर्यावरणीय चिंताओं को नजरअंदाज करके आर्थिक विकास की दिशा में दौड़ना खुद अपनी कब्र खोदना नहीं है?

सवाल और भी बनते हैं। शायद अनगिनत। कभी कांग्रेस सरकार के सिपहसालार रहे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कुछ दिनों पहले पोर्ट ब्लेयर में अंडमान एवं निकाबोर जनजातीय शोध संस्थान का उद््घाटन करते हुए देश से कई आदिवासी समुदायों के विलुप्त होने पर चिंता जाहिर की। उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासी विकास की नीतियां उनकी जीवन पद्धति के अनुरूप होनी चाहिए। अब सवाल है कि जब सरकार आर्थिक विकास और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की चाहत में जंगलों को ही साफ करने में लग गई है तो ऐसे हालात में आदिवासी समाज रहेगा कहां? वन आधारित उनकी जीवन शैली वनों के अभाव में कैसे संभव है?

वनों से लगातार खदेड़े जा रहे आदिवासियों की हालत वैसी ही होती जा रही है जैसे मां की गोद से छिन जाने वाले दुधमुंहे बच्चे की होती है। जब एक आम संवेदनशील मनुष्य यह समझ सकता है कि वनभूमि आदिवासियों की मां है, जो उन्हें पोसती है और जिसके आंचल की छांव में आदिवासी संस्कृति सुरक्षित रहती है, तो सरकार इसे क्यों नहीं समझ पा रही है?

एक तरफ सरकार पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने के लिए बाघों और अन्य विलुप्तप्राय पशु-पक्षियों की प्रजातियों का संरक्षण करना चाहती है और इसके लिए करोड़ों रुपए खर्च कर रही है, वहीं दूसरी तरफ वनों में वृक्षों की पूजा करने वाले आदिवासियों और अन्य परंपरागत वनवासियों को जंगलों से अलग करती जा रही है।

हम सब जानते हैं कि वन और आदिवासियों का संबंध इकतरफा नहीं बल्कि परस्परता का है। जंगल जहां आदिवासियों की जीवन संबंधी जरूरतों की पूर्ति करते हैं वहीं उनकी जीवन शैली में जंगलों का संरक्षण स्वत: समाहित है। इन सब बातों पर विचार करने के बाद ही वन अधिकार अधिनियम-2006 अस्तित्व में आया, जिसने वनों और आदिवासियों-वनवासियों के अंतर-संबंधों को देखते हुए उन्हें कुछ महत्त्वपूर्ण अधिकार दिए। विडंबना यह है कि आज वन अधिकार अधिनियम द्वारा आदिवासियों को मिले अधिकारों और पर्यावरणीय स्वीकृति संबंधी नियमों को ताक पर रख कर केवल आर्थिक संवृद्धि रूपी गोले दागने की कोशिश की जा रही है।

पिछले कई वर्षों से ओड़िशा के जगतसिंहपुर जिले में लगने वाली दक्षिण कोरियाई पोहांग स्टील कंपनी (पॉस्को) की बारह अरब डॉलर की विशालकाय इस्पात संयत्र परियोजना का वहां के स्थानीय समुदायों की तरफ से व्यापक विरोध होता रहा है।

आंदोलनकारियों के अनुसार पॉस्को परियोजना के कारण एक तरफ जहां स्थानीय समुदायों की बाईस हजार की आबादी को अपने जल-जंगल-जमीन से विस्थापित किया जाएगा वहीं पर्यावरण पर भी इसके गंभीर दुष्प्रभाव पड़ेंगे। आंदोलनकारी अपनी जमीन और पर्यावरण को बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। इस परियोजना पर जयराम रमेश के कार्यकाल में स्वयं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा और फिर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण द्वारा भी रोक लगाई गई थी। इस परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन करने वाले अधिकतर विशेषज्ञों का मानना है कि इससे होने वाले लाभ की तुलना में नुकसान ज्यादा हैं।

परियोजना की बाबत स्थानीय लोगों की आजीविका और पर्यावरण को होने वाले नुकसान का पॉस्को द्वारा प्रायोजित ‘स्वतंत्र’ एजेंसी ने जो आकलन किया था उसमें अनेक गड़बड़ियां हैं। इस आकलन में जिस तरह महत्त्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज किया गया है उस पर पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की ओर से गठित मीना गुप्ता समिति के ही तीन सदस्यों ने गंभीर चिंता व्यक्त की थी। लेकिन तब भी सरकार ने अपनी एजेंसी से नुकसान संबंधी कोई सर्वेक्षण कराना जरूरी नहीं समझा। उलटे परियोजना से होने वाले लाभ को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है।

सारी चिंताओं को नजरअंदाज करते हुए केंद्र और ओड़िशा सरकार का सारा जोर परियोजना को जल्द से जल्द शुरू कराने पर है। वीरप्पा मोइली ने मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार संभालते ही पर्यावरण और स्थानीय समुदायों की चिंता किए बिना पिछले महीने की सात तारीख को इस परियोजना को स्वीकृति दे दी। यह मंजूरी दर्शाती है कि सरकार किसके साथ खड़ी है। विडंबना है कि यह सब लोकतंत्र के झंडे तले होता है।

http://www.jansatta.com/index.php?option=com_content&view=article&id=58915:2014-02-08-06-28-37&catid=20:2009-09-11-07-46-16


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