Deprecated (16384): The ArrayAccess methods will be removed in 4.0.0.Use getParam(), getData() and getQuery() instead. - /home/brlfuser/public_html/src/Controller/ArtileDetailController.php, line: 150
 You can disable deprecation warnings by setting `Error.errorLevel` to `E_ALL & ~E_USER_DEPRECATED` in your config/app.php. [CORE/src/Core/functions.php, line 311]
Deprecated (16384): The ArrayAccess methods will be removed in 4.0.0.Use getParam(), getData() and getQuery() instead. - /home/brlfuser/public_html/src/Controller/ArtileDetailController.php, line: 151
 You can disable deprecation warnings by setting `Error.errorLevel` to `E_ALL & ~E_USER_DEPRECATED` in your config/app.php. [CORE/src/Core/functions.php, line 311]
Warning (512): Unable to emit headers. Headers sent in file=/home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php line=853 [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 48]
Warning (2): Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php:853) [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 148]
Warning (2): Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php:853) [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 181]
न्यूज क्लिपिंग्स् | कभी स्वर्ग, आज वीरान!- हरिवंश

कभी स्वर्ग, आज वीरान!- हरिवंश

Share this article Share this article
published Published on Aug 27, 2013   modified Modified on Aug 27, 2013

वेतन लाखों में हो गये. लेकिन वेतन बढ़ने से वास्तविक उत्पादन या आय पर क्या असर हुआ, इसे जांचने का कोई विश्वसनीय मेकेनिज्म नहीं है. अमेरिका के डेट्रायट शहर में यही हुआ. पेंशन का बोझ बढ़ता गया. रिटायर लोगों की पेंशन, नये नियुक्त लोगों की तनख्वाह से कई गुना अधिक. ऊपर से शहर की सरकार ने बाहर से कर्ज लेना जारी रखा. कर्ज अगर भोग-विलास के लिए लिया जाये, तो दुर्दशा तय है. इसी रास्ते दुनिया के शहंशाह भिखारी हो गये.

अमेरिकी शहरों के दिवालिया होने के इतिहास में सबसे बड़ा दिवालियापन! 18.07.2013 को अपने सभी कर्जदाताओं से बचाव व पेंशनधारियों के भुगतान से बचने के लिए डेट्रायट शहर सरकार ने दिवालिया हो जाने के तहत कानूनी संरक्षण मांगा है. कंगाल बनने के इतिहास में बड़े अमेरिकी शहर का यह हाल, बड़ी घटना है. स्वर्ग के श्मशान होने का सच. कुल 18.2 अरब डॉलर का कर्जदार शहर. हर डेट्रायट शहरवासी पर 27 हजार डॉलर का कर्ज है. मिशिगन राज्य (जिसमें यह शहर है) के गवर्नर ने इस शहर के ध्वस्त होने का विवरण दिया. एक नागरिक की शिकायत पर 58 मिनट बाद पुलिस पहुंचती है, जबकि अमेरिका में किसी सूचना पर औसतन 11 मिनट में पुलिस पहुंच जाती है.

2013 की पहली तिमाही में कुल एंबुलेंस गाड़ियों में एक तिहाई ही काम कर रही थीं. शहर में 78 हजार भव्य भवन खाली हैं. बेरोजगारी वर्ष 2000 से तीन गुना बढ़ गयी है. पिछले 40 वर्षो में आत्महत्या की दर सर्वाधिक है. गवर्नर के अनुसार यह शहर अपने नागरिकों को जरूरी बुनियादी सुविधाएं मुहैया नहीं करा पा रहा. शहर पर इतना कर्ज है कि प्रति एक रुपया आमद में से 38 पैसा कर्ज भुगतान में जाता है. 2017 तक यह 65 पैसे प्रति रुपये हो जायेगा. शहर अपनी दुर्लभ कलाकृतियों-भवनों को बेचने की योजना बना रहा है. जरूरी खर्च चलाने के लिए. भारत के रईस-रजवाड़ों जैसे दुर्दिन. कभी शहंशाह थे, पर दो गज जमीन भी मयस्सर नहीं.

शहर आज श्मशान जैसा वीरान है. वैभव के शिखर से दरिद्रता के पाताल तक. वसंत ऋतु से ही शहर की 40 फीसदी सड़कों पर लगे बिजली के खंभे अंधेरे में डूबे हैं. दसियों हजार घर खाली हैं. स्कूल बंद हो गये हैं. पिछले एक दशक में इस शहर की 25 फीसदी आबादी भाग चुकी है. 1950 में डेट्रायट की आबादी लगभग 18.50 लाख थी. तब मैन्युफैक्चरिंग में 2.96 लाख रोजगार थे. 2011 में आबादी रह गयी है, सात लाख. मैन्युफैक्चरिंग में सिर्फ 27 हजार नौकरियां हैं. शहर के 60 फीसदी बच्चे गरीबी में रह रहे हैं. 50 फीसदी से अधिक अब यहां निरक्षरता है. शहर की तीस फीसदी जमीन खाली है. वीरान. कुल आबादी के 10.6 फीसदी लोग खुद को श्वेत बताते हैं. यानी अश्वेतों की संख्या ही अधिक रह गयी है. करीब 83 फीसदी. शहर में संपत्ति कर से आमद घट गयी है. आयकर से आमद नहीं हो रही है. शहर की व्यवस्था कर्ज और देनदारी में डूबी है. इस शहर को चलानेवाले नेताओं ने पहले ही इतना कर्ज ले लिया है कि अब यह शहर चुकाने की स्थिति में नहीं है. कर्ज चुकाने के लिए कर बढ़ाया, तो लोग शहर छोड़ कर भागने लगे.

यही डेट्रायट शहर, 1960 में प्रति व्यक्ति आमद की दृष्टि से सबसे संपन्न शहर था. विशेषज्ञ कहते हैं कि तब यह दुनिया के सबसे अधुनातन उद्योगों, टेक्नोलॉजी और बड़े औद्योगिक घरानों का केंद्र था. धन का प्रवाह केंद्र. अमेरिका का पांचवां सबसे बड़ा शहर. दुनिया के सबसे बड़े वाहन-कार निर्माता जनरल मोटर्स, फोर्ड और क्रिसलर का शहर. शहर की खूबसूरत झीलों के आसपास मैन्युफैक्चरिंग इकाइयां थीं. संपन्नता ने इसे ‘स्वर्ग’ में बदल दिया था. लेकिन समय पलटा. 30-40 वर्षो में ही यह शहर खंडहर, श्मशान और कब्रगाह की झलक दे रहा है. रिटायर लोगों को पेंशन नहीं मिलने की स्थिति है. शहर सरकार द्वारा जारी बांड वगैरह महज कागज के टुकड़े रह गये हैं. निवेशक सड़क पर हैं. यह क्यों और कैसे हुआ?

इस पर अमेरिका सहित दुनिया, स्तब्ध और बहस में व्यस्त है. कोई इसे पूंजीवाद का अंतर्विरोध कह रहा है. कोई कुछ और कारण गिना रहा है. सिर्फ आटो इंडस्ट्री पर निर्भरता, ट्रेड यूनियन नेताओं की मारक भूमिका, पेंशन का बोझ, स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता खर्च वगैरह कारण गिनाये जा रहे हैं. अमेरिका के इस शहर का पतन कैसे हुआ. इसे आज के भारतीय आर्थिक हालात से जोड़ कर देखना है. अर्थव्यवस्था का बुनियादी सिद्धांत है, उत्पादन बढ़ाना. गंवई भाषा या ठेठ ग्रामीण अंदाज या आम बोलचाल की भाषा में कहें, तो जैसे एक किसान खेती करता है, खेत कोड़ता-जोतता है, हेंगाता है, रखवाली करता है, यानी पसीना बहाता है, फिर बीज डालता है, खाद डालता है, सिंचाई करता है, यानी पूंजी लगाता है.

फिर समय लगता है, तब खेत में अनाज होता है. फर्ज करिए कि एक किलोग्राम बीज डाला, तो दस किलोग्राम अनाज उपजा. ठेठ भाषा में कहें, तो यह उत्पादन प्रक्रिया है. निवेश और उत्पादन के इस रिश्ते को समझा जा सकता है. शेयर बाजार में पैसा लगा दिया, सर्विस इंडस्ट्री में काम कर लिया या आज के ह्वाइट कालर जॉब में लाखों कमा लिया, तो इन क्षेत्रों में निवेश-उत्पादन मापने का विश्वसनीय फामूर्ला क्या है? सरकार के कोष से एक सांसद, मंत्री या विधायक पर करोड़ों खर्च होते हैं, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था में इनका सीधा उत्पादन-योगदान क्या है? एक आइएएस-आइपीएस अफसर पर करोड़ों का खर्च है.

स्वास्थ्य की भारी सुविधाएं है. रिटायर होने पर मोटी पेंशन हैं. पर उनका सीधा उत्पादन-योगदान क्या है? इसे मापने का कोई यंत्र है? कारखाने में एक मजदूर काम करता है, तो उसका उत्पादन मापा जा सकता है. उसकी तनख्वाह उसी अनुपात में होती है. आज एक विश्वविद्यालय के अध्यापक की तनख्वाह लाखों में है. पर सप्ताह में बमुश्किल वह दो-चार क्लास लेते हैं. जिन छात्रों को पढ़ाने में वे लगे हैं, उन छात्रों की आम योग्यता यह है कि वे पीएचडी करके आवेदन नहीं लिख पा रहे. इस तरह के विभागों पर अरबों-अरबों खर्च का मतलब क्या रह गया है? आज भारतीय अर्थव्यवस्था की क्या स्थिति है. वेतन-पेंशन मद में क्या खर्च हैं? इन आंकड़ों पर गौर करें.

देश वर्ष 2010-11 में देश पर कुल कर्ज था, 5,444,037 करोड़ रुपये. इसमें से 3,415,933 करोड़ का कर्ज केंद्र सरकार ने लिया है और 2,028,104 करोड़ का कर्ज सभी राज्यों ने मिल कर लिया है. इस तरह 2010-11 के आंकड़ों के अनुसार, देश का हर नागरिक आज 44,984.60 रुपये का कर्जदार है (स्नेत- सीएजी रिपोर्ट, 2010-11). भारत का राजस्व घाटा आज खतरनाक स्थिति में है. विदेशी कर्ज का बड़ा बोझ है. अर्थशास्त्रियों के बीच चर्चा है कि क्या 1991 के आर्थिक संकट की स्थिति में भारत पहुंच गया है? आर्थिक विकास दर बहुत नीचे है. बड़ा बजट घाटा है. मुद्रास्फीति की बुरी स्थिति है. रुपया लगातार गिर रहा है. याद रखिए, प्रधानमंत्री दुनिया के शीर्ष अर्थशास्त्रियों में माने जाते हैं. वित्त मंत्री चिदंबरम अपनी योग्यता (कांपिटेंसी) और क्षमता (इफीशियंसी) के लिए सर्वश्रेष्ठ मंत्री कहे जाते हैं, तब भारतीय अर्थव्यवस्था की यह दुर्दशा है. एक स्तंभकार ने एक बड़े बिजनेस अखबार में लिखा की जल्द ही वित्त मंत्री अब यह कहनेवाले हैं कि भारत का यह अर्थसंकट, नरेंद्र मोदी की साजिश है, यूपीए के खिलाफ.  वर्ष 2010-11 में केंद्र का कुल बजट था, 1,108,749 करोड़ रुपये. इसमें से 88,650.74 करोड़ वेतन पर खर्च हुए और 42,840.26 करोड़ पेंशन पर. इस तरह बजट का 11.86 फीसदी सिर्फ वेतन-पेंशन पर खर्च हुआ (स्नेत- वित्त मंत्रलय, भारत सरकार). संगठित क्षेत्र के लोगों का उत्पादन-योगदान आंके बिना लगातार वेतन, सुविधाएं बढ़ाना औचित्यहीन है. दशकों से यह हो रहा है. उधर किसानों का हाल देखिए, जिनके उत्पादन पर हम जीते हैं, उनकी आय 60 वर्षो में कितनी बढ़ी?

झारखंड

वर्ष 2011-12 में झारखंड का बजट 26,082.47 करोड़ था. इसमें से 6150.05 करोड़ वेतन मद में खर्च हुए और 2296.69 करोड़ पेंशन मद में. यानी कुल बजट का 32.38 फीसदी सिर्फ वेतन और पेंशन पर खर्च हुआ (स्नेत- सीएजी रिपोर्ट). महज कुछ लाख सरकारी कर्मचारियों पर. लेकिन करोड़ों झारखंडी जनता के विकास पर उस अनुपात में कितना खर्च हुआ?

} वर्ष 2012-13 में झारखंड का बजट 37,300.52 करोड़ रुपये था. इसमें से 7430.99 करोड़ वेतन मद में खर्च हुए और 2232.25 करोड़ पेंशन मद में. यानी कुल बजट का 25.9 फीसदी सिर्फ वेतन और पेंशन मद में खर्च हुआ.

वर्ष 2013-14 में झारखंड का बजट 39548.90 करोड़ है. अनुमानित खर्च के अनुसार इसमें से 8143.59 करोड़ वेतन पर तथा 3061.26 करोड़ पेंशन पर खर्च होंगे. इस तरह कुल बजट का 28.33 फीसदी सिर्फ वेतन और पेंशन पर खर्च होगा. (नोट- वित्तीय वर्ष 2012-13 तथा 2013-14 के आंकड़ों का स्नेत बजट है)

बिहार

 वर्ष 2011-12 में बिहार का बजट 72,770 करोड़ रुपये था. इसमें से 12767 करोड़ वेतन मद में खर्च हुए और 7584 करोड़ पेंशन मद में. यानी कुल बजट का 27.96 फीसदी सिर्फ वेतन और पेंशन मद में खर्च हुआ.

वर्ष 2012-13 में बिहार का बजट 78,686 करोड़ था. इसमें से 14101 करोड़ वेतन मद में खर्च हुए और 10043 करोड़ पेंशन मद में. यानी कुल बजट का 30.68 फीसदी सिर्फ वेतन और पेंशन मद में खर्च हुआ.

वर्ष 2013-14 में बिहार का बजट 92087.93 करोड़ है. अनुमानित खर्च के अनुसार इसमें से 16836.92 करोड़ वेतन पर खर्च होंगे तथा 11274.04 करोड़ पेंशन मद में खर्च होंगे. इस तरह कुल बजट का 30.52 फीसदी सिर्फ वेतन और पेंशन पर खर्च होगा.

आज सरकार के बजट का बड़ा हिस्सा तनख्वाह में बंटता है. चाहे बिहार हो या झारखंड या देश. छठा वेतन आयोग लागू हो गया. खूब पैसे बढ़ गये. इस अनुपात में किसका काम कितना बढ़ा? और उस अनुपात में उन लोगों के बढ़े वेतन से भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर या जीडीपी में कितनी वृद्धि हुई? जिस अनुपात में वेतन बढ़े, उस अनुपात में देश या राज्यों की आर्थिक प्रगति या अन्य मामलों में इजाफा हुआ? यही हालत पत्रकारिता समेत लगभग सभी क्षेत्रों में है. वेतन लाखों में हो गये. लेकिन वेतन बढ़ने से वास्तविक उत्पादन या आय पर क्या असर हुआ, इसे जांचने का कोई विश्वसनीय मेकेनिज्म नहीं है.

अमेरिका के डेट्रायट शहर में यही हुआ. पेंशन का बोझ बढ़ता गया. रिटायर लोगों की पेंशन, नये नियुक्त-भर्ती हुए लोगों की तनख्वाह से कई गुना अधिक. ऊपर से शहर की सरकार ने बाहर से कर्ज लेना जारी रखा. कर्ज अगर भोग-विलास के लिए लिया जाये, तो दुर्दशा तय है. इसी रास्ते दुनिया के शहंशाह भिखारी हो गये. यह अर्थशास्त्र का बुनियादी नियम है. इसे नोबल पुरस्कार प्राप्त विद्वान अपने नये-नये सिद्धांतों या विकास मॉडल से नहीं बदल सकते? जैसे ही आमद के अनुपात से खर्च की सीमा टूटती है, तबाही आती है. यह भारत के गांवों का देशज सूत्र है. क्रे डिट कार्ड की इकानॉमी का सिद्धांत नहीं. दस क्रेडिट कार्ड ले लिया. उधार लेते गये. अचानक एक दिन कंगाल हो गये. यही आज की अर्थव्यवस्था में हो रहा है. डेट्रायट में यही हुआ. भारत भी इसी रास्ते पर है.

http://www.prabhatkhabar.com/news/37727-sometime-heaven-now-arid.html


Related Articles

 

Write Comments

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Video Archives

Archives

share on Facebook
Twitter
RSS
Feedback
Read Later

Contact Form

Please enter security code
      Close