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न्यूज क्लिपिंग्स् | जारी है सरकार और एनजीओ के बीच की रस्साकशी

जारी है सरकार और एनजीओ के बीच की रस्साकशी

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published Published on Apr 24, 2015   modified Modified on Apr 24, 2015
अरविंद दुबे. नरेंद्र मोदी सरकार के गठन के बाद से सिविल सोसाइटी के काम करने के तौर-तरीकों की नए सिरे से समीक्षा हो रही है। ताजा मामला गैर सरकारी संगठन फोर्ड फाउंडेशन का है, जिसे निगरानी सूची में डाल दिया गया है। स्पष्ट है विदेशी फंडिंग से चलने वाले कई स्वयंसेवी संगठनों के लिए राह अब आसान नहीं रह गई है। 'सरकार बनाम एनजीओ' रस्साकशी के बीच यह जानना अहम है कि दोनों क्या चाहते हैं और दोनों क्या कर रहे हैं।

09 अप्रैल को सरकार ने पर्यावरण के लिए काम करने वाले संगठन ग्रीनपीस के लाइसेंस को रद्द करते हुए इसके भारत में सभी बैंक खातों को सील कर दिया। इससे पहले आईएनएसएएफ को भी सरकार बंद करने की नाकाम कोशिश कर चुकी है।

सरकार कहती है, कुछ स्वयंसेवी संगठन विदेशों से धन ले रहे हैं, लेकिन FCRA यानी फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेग्यूलेशन एक्ट के नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं। उसे आशंका है कहीं इस धन का राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में तो उपयोग तो नहीं हो रहा? यह आशंका इस साल जनवरी में केंद्रीय गृहमंत्रालय को पेश अपनी रिपोर्ट में आईबी ने जताई थी।

फंड्स के इस्तेमाल को लेकर सवाल

केंद्रीय गृहमंत्रालय का कहना है कि विदेशों से आर्थिक सहायता प्राप्त गैर सरकारी संगठनों में से 10,000 से अधिक ने 2009 से अब तक आय-व्यय का हिसाब नहीं दिया है। ये संगठन मनी-लॉंड्रिंग और आतंकी गतिविधियों में लिप्त हो सकते हैं। मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक, ग्रीनपीस को एफसीआरए एक्ट, 2010 के तहत विदेश से आने वाली आर्थिक मदद के 'सही आंकड़े छुपाने' और 'विकास के खिलाफ़' अभियान चलाने का दोषी पया गया है।'

फरवरी में पेश केंद्रीय गृहमंत्रालय की खुफिया रिपोर्ट कहा गया कि ये संस्थाएं विदेशी धन लेकर ऐसा माहौल बना रहीं हैं, जिससे विकास की कई परियोजनाएं बाधित हो रहीं हैं।

यूं कसता गया शिकंजा

30 सितंबर 2014 : विदेशों से आर्थिक सहायता प्राप्त कर रहे 10,331 एनजीओ को कारण बताओ नोटिस। पूछा गया कि बीते पांच साल से इनकम टैक्स रिटर्न क्यों दाखिल नहीं किया?

11 जनवरी 2015 : ग्रीनपीस इंडिया की वरिष्ठ कार्यकर्ता प्रिया पिल्लई को आव्रजन अधिकारियों ने लंदन के लिए उड़ान भरने से रोक दिया। प्रिया लंदन में ब्रिटिश सांसदों के समक्ष भारतीय आदिवासियों के अधिकारों के उल्लंघन का मामला उठाने वाली थीं।

24 जनवरी 2015 : आईबी ने सरकार को सौंपी खुफिया रिपोर्ट। 188 एनजीओ पर विदेशी फंड का दुरुपयोग, उग्रवादियों के संबंध रखने और धर्मांतरण में लिप्त होने के आरोप।

3 मार्च 2015 : आंध्रप्रदेश के उन 1142 संगठनों का एफसीआरए लाइसेंस रद्द, जिन्होंने 30 सितंबर 2014 के कारण बताओ नोटिस का जवाब नहीं दिया।

9 अप्रैल 2015 : गृहमंत्रालय ने ग्रीनपीस के भारत में पंजीकरण को 180 दिनों के लिए निलंबित कर दिया है। सारे बैंक खाते सील।

5 अप्रैल 2015 : मोदी ने जजों के सम्मेलन में न्यायपालिका को पांच सितारा एनजीओ के प्रभाव में न आने की सलाह दे डाली। मचा बवाल।

तब थी सरकार में पैठ, अब..?

भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार जहां शुरू से एनजीओ के प्रति सख्त है, वहीं पूर्ववर्ती यूपीए सरकार का रुख ठीक उलट था। यहां तक कि इन संगठनों को सरकार में अप्रत्यक्ष रूप से स्थान भी मिला हुआ था। सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाले नेशनल एडवाइजरी काउंसिल (एनएसी) और योजना आयोग के जरिए इस सिविल सोसायटी को सरकार में प्रतिनिधित्व हासिल था।

कोर्ट पहुंचने लगी लड़ाई

सरकार की इस सख्ती के खिलाफ कुछ संगठनों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। प्रिया पिल्लई मामले में दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला सरकार को झटका देने वाला रहा। बीती 12 मार्च को हुई सुनवाई में न्यायमूर्ति राजीव शकधर ने लुकआउट नोटिस रद्द करते हुए कहा, लोकतंत्र का मुंह बंद नहीं किया जाना चाहिए। नागरिकों को विकास नीति पर सरकार से असहमत होने या अलग विचार रखने का पूरा अधिकार है।

ग्रीनपीस का फंड रोकने की इससे पहले की सरकार की कोशिश भी नाकाम रही थी। तब दिल्ली हाईकोर्ट ने 20 जनवरी को सरकार आदेश दिया था कि ग्रीनपीस इंडिया को ग्रीनपीस इंटरनेशनल से पैसे लेन-देन की अनुमति दी जाए, क्योंकि सरकार अदालत में यह साबित करने में असफल रही थी कि इस तरह के फंड को अवरूद्ध किया जाना क्यों न्यायोचित है।

कुछ एनजीओ की नजर में बदनीयत है सरकार

कुछ संगठनों का आरोप है कि सरकार बदनीयती से कार्रवाई कर रही है। ग्रीनपीस इंडिया की डायरेक्टर दिव्या रघुनंदन कहती हैं, सरकार ने पिछले साल से ग्रीनपीस के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी थी। एकतरफा कार्रवाई की जा रही है। अधिकारी बार-बार बेतुके सवाल पूछ रहे हैं। ग्रीनपीस हर साल टैक्स रिटर्न की कार्रवाई पूरी करता है, लेकिन फिर भी नोटिस पर नोटिस थमाए जा रहे हैं।

कुछ संगठनों के मुताबिक, सरकार वन तथा पर्यावरण मंत्रालयों के अपने ही कानूनों को धता बताते हुए प्रोजेक्ट लगाना चाहती है, जबकि संगठन कानून के दायरे में रहकर विरोध कर रहे हैं। सरकार को यह विरोध रास नहीं आ रहा है।

यह भी पढ़ें ; भारतीय एनजीओ से ऑस्ट्रेलिया ने ली प्रेरणा

आईएनएसएएफ के अनिल चौधरी कहते हैं, अब यह सरकार आलोचना बर्दाश्त नहीं करती। आलोचक दृष्टि रखने वालों को सीधा निशाना बनाती है। यही गुजरात मॉडल है, जहां जनता को मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। सरकार खुद ताल ठोंक कर विदेशी निवेश को न्योता दे रही है, तो ऐसे संगठनों के साथ सौतेला व्यव्हार क्यों हो रहा है। मालूम हो, सरकार इसी संगठन को बंद करने की नाकाम कोशिश कर चुकी है।

विकास संवाद के सचिन जैन का मानना है कि सरकार उन संगठनों को दबाना चाहती है जो उससे सवाल पूछ रहे हैं या उसकी नजर में बाधा बन रहे हैं। हो सकता है कि कुछ संगठन कानून का पालन नहीं कर रहे हों, लेकिन उन पर कार्रवाई करने का एक तरीका है। आप कार्रवाई करें और उनका जो जवाब आए, उसे भी सुनें।

स्पंदन के प्रकाश की नजर में यह एक विचारधारा का फर्क है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी जगह सही हैं। ग्रीनपीस सोचता है कि पर्यावरण बचा रहे, वहीं सरकार का मानना है कि यदि प्रोजेक्ट्स अटके रहेंगे तो विकास कैसे होगा।

कहां तक जाएगी यह लड़ाई?

ग्रीनपीस इंडिया की डायरेक्टर दिव्या रघुनंदन को उम्मीद है कि जनता उनके साथ खड़ी रहेगी। कोर्ट उनके साथ न्याय करेगा। जाहिरतौर पर गेंद कोर्ट के पाले में है। जहां सरकार के पक्ष में फैसला होता है तो आगे चलकर उसे यह साबित करना होगा कि वह विकास के साथ ही पर्यावरण का भी ख्याल रख रही है। वहीं, सिविल सोसायटी को भी जनता के बीच यह भरोसा कायम रखना होगा कि सरकार उन पर गलत शक कर रही थी।

 


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