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न्यूज क्लिपिंग्स् | रोजगार देनेवाला एफडीआइ आये -- वरुण गांधी

रोजगार देनेवाला एफडीआइ आये -- वरुण गांधी

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published Published on Jun 15, 2017   modified Modified on Jun 15, 2017
भारत की अर्थव्यवस्था में एक अनोखा अंतर्विरोध दिख रहा है. बीते कुछ दशकों में, खासकर विकासशील देशों में पाया गया है कि मैक्रो इकनॉमिक्स में आर्थिक विकास और रोजगार सृजन के लिए एफडीआइ रामबाण है. ज्यादा एफडीआइ आने का मतलब देश की आर्थिक नीतियों की स्वीकार्यता समझा जाता है और अर्थव्यवस्था की तंदुरुस्ती का संकेतक माना जाता है. पिछले कुछ वर्षों में स्थिर रहने के बाद बीते तीन वर्षों में एफडीआइ 28.2 प्रतिशत (1.44 लाख करोड़ रुपये) की तेज रफ्तार से बढ़ रहा है. यह एफडीआइ के नियमों में राहत देने और कारोबार करने में आसानी के लिए किये गये उपायों के चलते हुआ है.

फिर भी, भारत में रोजगार की दर घटी है. देश के 30 फीसदी से ज्यादा युवा बेरोजगार हैं. भारत की रोजगार सापेक्षता (जितना फीसदी जीडीपी में बढ़ोत्तरी होगी, उसी अनुपात में रोजगार बढ़ेगा) 1991 के 0.3 फीसदी से गिर कर 0.15 फीसदी पर आ गयी है. रोजगार में 50 फीसदी की यह गिरावट एफडीआइ की सीमाओं को रेखांकित करती है. स्टार्टअप निवेश को लेकर जैसा हो-हल्ला मचा था, उस हिसाब से नौकरियों का ढेर लग जाना चाहिए था. लेकिन, नौकरियों में छंटनी का दौर शुरू हो गया और पिछले साल 10,000 लोग नौकरी गंवा चुके हैं. अगले कुछ वर्षों में टेलीकॉम और अॉटोमोबाइल सेक्टर में कंपनियों के विलय और रोजगार पैदा करनेवाले आइटी जैसे प्रमुख सेक्टर में वीजा कानूनों में बदलाव व ऑटोमेशन के कारण बड़े पैमाने पर पुनर्गठन होगा. इससे रोजगार के मौके और संकुचित होंगे.

श्रमिक उत्पादन क्षमता में इजाफे ने एक क्रूर विडंबना के साथ खनन जैसे क्षेत्रों में काम करनेवालों की संख्या में कमी कर दी है. साल 1994-95 में एक करोड़ रुपये का खनिज निकालने में 25 मजदूर लगाने पड़ते थे.

अब सिर्फ 8 लगाने पड़ते हैं. तार्किक रूप से देखें तो एफडीआइ में बढ़ोत्तरी से प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार बढ़ने चाहिए थे- लेकिन भारत में भौगोलिक और क्षेत्रीय विषमताओं ने अपना असर दिखाया. महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे शहरीकृत राज्यों (2014 से 2017 के बीच इन राज्यों ने कुल 13.4 लाख करोड़ रुपये से अधिक एफडीआइ पाया, जो भारत में आये कुल एफडीआइ का करीब 75 फीसदी है) में एफडीआइ गयी. यह बढ़ता ही जा रहा है.

इधर, भौगोलिक रूप से बड़े क्षेत्र वाले उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश को 2014 से 2017 के दौरान एफडीआइ का मात्र एक प्रतिशत मिला. जैसे-जैसे यह एफडीआइ बढ़ेगा, शहरीकृत, संपन्न राज्य और संपन्न होंगे, जिससे अन्य राज्यों के लिए पूंजी आकर्षित करना ज्यादा कठिन होता जायेगा. क्षेत्रीय भेदभाव में फायदा पानेवाले, खासकर सेवाओं और आइटी में रोजगार के अवसर सीमित हैं. वहीं बड़ी संख्या में रोजगार सृजित करनेवाले निर्माण क्षेत्र में एफडीआइ की हिस्सेदारी घट रही है.

पूंजी आकर्षित करने में जाहिर तौर पर भारत ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे उभरते बाजारों से आगे है, लेकिन बड़ी संख्या में रोजगार पैदा करनेवाले सेक्टर में पूंजी लाने में विफल रहा है.

हम रोजगार-विहीन विकास कर रहे हैं. बीते कुछ दशकों में हमने रोजगार सृजन और कृषि से आमदनी की कीमत पर एफडीआइ की पूंजी को बढ़ावा दिया है. एमएसएमइ (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग) में बड़ी संख्या में रोजगार मिलता है, लेकिन इस सेक्टर में विकास दर स्थिर बनी हुई है. भारत में एक समग्र एमएसएमइ कानून होना चाहिए, जिसमें भूमि अधिग्रहण, श्रमिकों के मामले, फैक्ट्री बनाने या किराये पर लेने जैसी सारी बातें समाहित हों. इस सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए कर नीतियों में सूक्ष्म इकाइयों को 10 साल का टैक्स हॉलिडे दिया जा सकता है, जबकि लघु और मध्यम दर्जे की इकाइयों के लिए नीची कर दरें लागू की जा सकती हैं.

एफडीआइ में क्षेत्रीय असमानता को दूर करते हुए अधिक रोजगार देनेवाले सेक्टरों में बड़ी मात्रा में एफडीआइ आकर्षित करने के लिए पिछड़े राज्यों में काम शुरू करने पर शर्तें आसान करने पर विचार किया जा सकता है. यह कदम शहरों की तरफ पलायन रोकने में भी मददगार होगा. गरीब राज्यों में समान विकास के लिए एफडीआइ में भौगोलिक बिखराव को नियंत्रित करना काफी मुश्किल है. निवेश बढ़ाने के लिए सिर्फ नीतिगत उपाय ही काफी नहीं हैं, पिछड़े राज्यों में मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और औद्योगिक आधारभूत ढांचा बढ़ाने की भी जरूरत है. मेक इन इंडिया योजना में इसे भी समाहित किया जाना चाहिए.

रिकॉर्ड मात्रा में एफडीआइ आने के बाद भी सर्विस सेक्टर में रोजगार सृजन में मंदी का सामना करने के लिए, नेशनल मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी (एनएमसी) से तालमेल रखते हुए सेवाओं के लिए एक एकीकृत नीति का अनुपालन किया जाना चाहिए. सेवाओं को लेकर फिर से सरकारी नीति में सही दिशा में ध्यान देने की जरूरत है, जिसमें सबसे निचले पायदान की- शारीरिक श्रम से लेकर उच्च स्तर की इंटरनेट आधारित सेवाएं शामिल की जानी चाहिए, जिससे कि हम भविष्य में रोजगार के अवसरों में ऐसी कमी का सामना करने के लिए तैयार रहें.

बिना सही तैयारी के दूसरे देशों से किये गये व्यापारिक समझौतों से अपने ही ऊपर शुल्कों का बोझ पड़ा. कच्चे माल पर ऊंची दर से आयात शुल्क देना पड़ा, जबकि तैयार माल पर कम शुल्क मिला. इससे हमारे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को अपूर्णीय क्षति उठानी पड़ी. इससे रोजगार सृजन हतोत्साहित हुआ.

भारत में बिना शुल्क दिये पोशाकें आयात की जा सकती हैं, जबकि उनके लिए कच्चे माल हाथ से निर्मित धागे पर 10 फीसदी शुल्क लगता है. लैपटॉप और मोबाइल फोन को आयात करना आसान है, जबकि इनके पुर्जों पर ऊंचे दर का शुल्क लगता है.

इस किस्म के व्यापारिक समझौते भारत के निर्यात के लिए बाजार खोलने में विफल रहे. याद रखिये कि एफडीआइ के आर्थिक फायदे अल्पकालिक और अप्रत्याशित हैं, इसलिए पब्लिक निवेश को बढ़ावा देना जरूरी है जो सामाजिक-आर्थिक प्रतिफल देता है. भारत को एफडीआइ लाने के लिए अपनी कोशिशें जारी रखनी चाहिए, लेकिन इसका प्रोफाइल इस तरह होना चाहिए कि यह रोजगार पैदा करनेवाला हो और स्थानीय विकास को बढ़ावा दे.


http://www.prabhatkhabar.com/news/columns/story/1005938.html


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