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न्यूज क्लिपिंग्स् | पिछड़ता क्यों गया उत्तर प्रदेश-- हरिवंश चतुर्वेदी

पिछड़ता क्यों गया उत्तर प्रदेश-- हरिवंश चतुर्वेदी

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published Published on Mar 28, 2017   modified Modified on Mar 28, 2017
आबादी, क्षेत्रफल और राजनीतिक प्रभुत्व के लिहाज से देश के तमाम राज्यों में उत्तर प्रदेश कितना ही आगे क्यों न हो, औद्योगिक विकास की दौड़ में यह पिछले 25 वर्षों में लगातार पिछड़ता गया है। नतीजतन, उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय व राष्ट्रीय आय में फर्क लगातार बड़ा बना हुआ है और मानव विकास के पैमानों पर इस प्रदेश की गिनती अब देश के सर्वाधिक पिछड़े राज्यों के साथ होती है। सबसे चिंता की बात यह है कि प्रदेश में बेरोजगारों की तादाद बेतहाशा बढ़ी है, किंतु रोजगार पैदा करने में इस प्रदेश का रिकॉर्ड लगातार गिरता गया है।

 

प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा की नई सरकार के गठन के बाद यह सवाल उभरकर आ रहा है कि औद्योगिक विकास के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश के पिछडे़पन को दूर करने के लिए औद्योगिक नीति-निर्धारण और उसके क्रियान्वन में ऐसे क्या बदलाव किए जाएं कि रोजगार के ज्यादा अवसर पैदा हो सकें? प्रदेश की जनसंख्या के एक बड़े वर्ग को यदि गरीबी, बदहाली, पिछड़ेपन और अशिक्षा से उबारना है, तो त्वरित औद्योगिक विकास के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है।

 

पिछले 25 वर्षों में उत्तर प्रदेश में भाजपा, बसपा और सपा की सरकारें कई बार बनीं और प्रदेश को औद्योगिक पिछड़ेपन से उबारने के प्रयास इनमें से हर पार्टी की सरकार द्वारा किए गए, लेकिन इस मिशन में किसी भी सरकार को कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। पिछली सदी के अस्सी के दशक में देश के औद्योगिक उत्पादन में उत्तर प्रदेश का हिस्सा नौ प्रतिशत था, जो अब पांच प्रतिशत रह गया है। प्रदेश की सकल आय में उद्योगों का हिस्सा इसी दौर में 15 प्रतिशत से घटकर नौ प्रतिशत रह गया है। ये आंकड़े बताते हैं कि पिछले 25 वर्षों में उत्तर प्रदेश के औद्योगिक विकास के लिए अपनाए गए तौर-तरीके लगातार विफल रहे हैं। प्रदेश की नई सरकार को यह विचार-मंथन करना होगा कि औद्योगिक विकास में उत्तर प्रदेश लगातार क्यों पिछड़ता जा रहा है?

 

उत्तर प्रदेश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था में रसायन, इंजीनियरिंग और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों की प्रधानता रही है। इनमें से ज्यादातर औद्योगिक इकाइयां लघु और मध्यम आकार की हैं, जिन्हें परिवार के लोग खुद या अन्य लोगों को नौकरी देकर चलाते हैं। प्रदेश में ऐसी 22.34 लाख गैर-पंजीकृत इकाइयां हैं, जो कि 37,024 करोड़ रुपये के उत्पादन करती हैं और करीब 51.76 लाख लोग इनमें काम करते हैं। इन इकाइयों का प्रदेश की औद्योगिक आय में करीब 49 फीसदी का योगदान है।

 

उत्तर प्रदेश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था में पारंपरिक हुनर और कारीगरी पर आधारित उद्योगों की बड़ी तादाद है। इनमें हथकरघा, जरदोजी, चिकन के काम, इत्र, पीतल, कांच, पौटरी, ताले, जूते, लकड़ी के फर्नीचर और खिलौने से संबंधित उद्योग उल्लेखनीय हैं। अस्सी के दशक में उत्तर प्रदेश के औद्योगिक विकास की तेज दर का मुख्य कारण केंद्र व राज्य की कांग्रेसी सरकारों द्वारा किया गया सार्वजनिक निवेश और निजी क्षेत्र को दिए गए प्रोत्साहन थे, जो मुख्यत: रायबरेली व अमेठी के आस-पास सीमित थे। मगर 1991 के बाद के उदारीकरण में सार्वजनिक निवेश पर आधारित यह औद्योगीकरण नहीं टिक पाया।

 

पिछले 25 वर्षों में यह भी देखा गया कि उत्तर प्रदेश के औद्योगिक विकास में क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ा है। वर्ष 1987-88 और 2010-11 के मध्यकाल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सूबे के रोजगारशुदा लोगों में हिस्सा 52 फीसदी से बढ़कर 74 फीसदी हो गया, जबकि बड़ी आबादी वाले पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड का हिस्सा 48 फीसदी से घटकर 26 फीसदी रह गया। औद्योगिक विकास की वृद्धि राष्ट्रीय राजधानी से सटे गौतम बुद्ध नगर और गाजियाबाद में देखी गई।

 

अखिलेश यादव सरकार ने साल 2012-17 के दौरान प्रदेश के औद्योगिक विकास के लिए बड़े औद्योगिक घरानों को आकर्षित करने के लिए जो प्रयास किए, उनमें भी कोई खास सफलता नहीं मिली थी। 2010-2015 की अवधि में 21,524 करोड़ रुपये के निवेश के लिए सहमति-पत्रों (एमओयू) पर दस्तखत हुए, जो पूरे देश में स्वीकृत समझौतों का महज 2.1 प्रतिशत था। इस दौरान वास्तविक निवेश 8,800 करोड़ ही हुआ, जो सालाना देखें, तो मात्र 1,500 करोड़ था।

 

इसलिए नई सरकार को उत्तर प्रदेश के भावी औद्योगिक विकास का खाका तैयार करते समय यह सोचना होगा कि वे क्या कारण थे कि पिछले 25 वर्षों में यह राज्य अपेक्षाकृत छोटे राज्यों के मुकाबले औद्योगिक विकास की दौड़ में पिछड़ता चला गया? यहां पूर्ववर्ती सरकारों ने बड़ी-बड़ी घोषणाएं की, पर नतीजे क्यों निराशाजनक रहे? नई सरकार को यह समझना जरूरी है कि कोई भी देशी-विदेशी पूंजीपति पूंजी लगाने से पहले यह जानना चाहेगा कि यहां पर राजनीतिक स्थिरता, कानून-व्यवस्था व राजकाज की हालत कैसी है? फिर औद्योगिक विकास के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे- जैसे सड़कें, परिवहन, बिजली, कच्चे माल की उपलब्धता और तकनीकी शिक्षा का स्तर कैसा है? उदारीकरण के दौर में गुजरात, तामिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में जो बुनियादी ढांचा विकसित किया गया, उसने ही निवेशकों को आकर्षित किया।


उत्तर प्रदेश के तेज औद्योगिक विकास के लिए योगी आदित्यनाथ सरकार को नीतियों और उनके क्रियान्वयन में पारदर्शिता, जवाबदेही, निरंतरता, समयबद्धता और क्षेत्रीय संतुलन पर जोर देना होगा। मित्र-पूंजीपतियों की अवधारणा से बचना होगा, जिससे यहां की पिछली सरकारें ग्रस्त रही हैं। उत्तर प्रदेश छोटे, मंझोले और हस्तकला पर आधारित उद्योगों का गढ़ रहा है। इन उद्योगों के विकास के लिए ‘क्लस्टर नीति' बनानी होगी। बड़े निर्माण उद्योगों की स्थापना से परहेज नहीं होना चाहिए, किंतु इन्हें चालू करने में ज्यादा पूंजी और समय की जरूरत होती है। दूसरे, ये उद्योग चूंकि बड़े स्तर पर स्वचालित प्रौद्योगिकी का प्रयोग करते हैं, इस कारण रोजगार के कम अवसर पैदा करते हैं।


गंगा-यमुना के दोआब में इतिहास, संस्कृति और धार्मिक पर्यटन के विकास की विराट संभावनाएं हैं, जिनके लिए पर्यटन व होटल उद्योगों को बढ़ावा देना होगा। उत्तर प्रदेश की जमीन उपजाऊ है और यहां के लोग परिश्रमी हैं। इसलिए यहां अनाज, फल, सब्जी, डेयरी-उत्पादन और मुर्गी-पालन, मछली-पालन आदि के विकास की जबर्दस्त संभावनाएं हैं। प्राकृतिक उत्पादों के सुनियोजित विकास से ग्रामीण व शहरी अर्थव्यवस्थाओं को जोड़कर उत्तर प्रदेश हर वर्ष लाखों रोजगार पैदा कर सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


http://www.livehindustan.com/news/guestcolumn/article1-why-uttar-pradesh-backwardness-755767.html


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