Deprecated (16384): The ArrayAccess methods will be removed in 4.0.0.Use getParam(), getData() and getQuery() instead. - /home/brlfuser/public_html/src/Controller/ArtileDetailController.php, line: 150
 You can disable deprecation warnings by setting `Error.errorLevel` to `E_ALL & ~E_USER_DEPRECATED` in your config/app.php. [CORE/src/Core/functions.php, line 311]
Deprecated (16384): The ArrayAccess methods will be removed in 4.0.0.Use getParam(), getData() and getQuery() instead. - /home/brlfuser/public_html/src/Controller/ArtileDetailController.php, line: 151
 You can disable deprecation warnings by setting `Error.errorLevel` to `E_ALL & ~E_USER_DEPRECATED` in your config/app.php. [CORE/src/Core/functions.php, line 311]
Warning (512): Unable to emit headers. Headers sent in file=/home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php line=853 [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 48]
Warning (2): Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php:853) [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 148]
Warning (2): Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php:853) [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 181]
न्यूज क्लिपिंग्स् | मुक्त बाजार का दुश्चक्र- सुनील

मुक्त बाजार का दुश्चक्र- सुनील

Share this article Share this article
published Published on Aug 27, 2013   modified Modified on Aug 27, 2013
जनसत्ता 27 अगस्त, 2013 : रुपया लुढ़कता जा रहा है। इसे रोकने की भारत सरकार और रिजर्व बैंक की सारी कोशिशें नाकाम होती जा रही हैं।

चारों तरफ घबराहट फैल रही है। इसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ रहा है। पेट्रोल सहित तमाम आयातित वस्तुएं महंगी होने से महंगाई का एक नया सिलसिला शुरू हो रहा है। एक तरह से हम महंगाई का आयात कर रहे हैं। इतना ही नहीं, विदेशी पूंजी वापस जाने का खतरा बढ़ने और भुगतान संतुलन की हालत गंभीर होने से पूरी अर्थव्यवस्था के अस्थिर होने का संकट पैदा हो गया है। क्या हम 1991 की ओर जा रहे हैं, यह सवाल उठने लगा है। तब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो गया था, भारत का सोना लंदन में गिरवी रखना पड़ा था और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष से कर्ज लेना पड़ा था, जिसकी शर्तों ने भारत की नीतियों को पूरी तरह से बदलने की शुरुआत कर दी थी।
इस संकट की चर्चा में ब्याज दरों, विदेशी पूंजी के मिजाज या मुद्रा प्रचुरता की नीति बदलने के अमेरिकी फैसले जैसी तात्कालिक घटनाओं और सतही उपायों की बात की जा रही है। लेकिन भारत इस शोचनीय हालत में क्यों पहुंचा, इसे समझने के लिए कुछ बुनियादी बातों पर गौर करना होगा। तभी इसका निदान हो सकेगा। नहीं तो दवा करने के साथ मर्ज बढ़ता जाएगा।
पहली बात तो यह है कि भुगतान संतुलन में जिस चालू खाते के घाटे की बात की जा रही है, वह कोई आज की बात नहीं है। पिछले ढाई दशक में हमारा चालू खाता लगातार ऋणात्मक रहा है। इस खाते को घाटे में रखने वाली चीज है भारत के विदेश व्यापार का भारी घाटा, जो न सिर्फ लगातार बना हुआ है बल्कि बढ़ रहा है। निर्यात बढ़ाने के लिए सरकार ने सब कुछ किया- करों में छूट दी, अनुदान दिए, सेज (विशेष आर्थिक जोन) बनाए। लेकिन निर्यात जितना बढ़ा उससे ज्यादा आयात बढ़ता रहा। पिछले पांच साल से तो अमेरिका, जापान, यूरोप में मंदी आने के बाद से भारत के निर्यात को बढ़ाना और मुश्किल हो गया है। ‘निर्यात आधारित विकास’ की बात एक मृग मरीचिका साबित हुई है।
इसके लिए ‘मुक्त व्यापार’ की वह नीति और विचारधारा भी दोषी है, जिस पर भारत ने 1991 से चलना शुरू किया और 1994 में डंकल मसविदे पर दस्तखत करने के साथ विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बन कर जिसे भारत ने पूरी तरह मंजूर कर लिया। इसके तहत भारत सरकार ने आयात पर से नियंत्रण और पाबंदियां पूरी तरह से हटा लीं और आयात शुल्क भी कम कर दिए। न केवल सोना-चांदी बल्कि विलासिता की तमाम वस्तुओं और उनके कल-पुर्जों के आयात को पूरी तरह खुला कर दिया और यह माना कि इससे विकास और वृद्धि में मदद मिलेगी।
जिस पेट्रोल के बढ़े आयात-खर्च का हल्ला अब हो रहा है, उसकी खपत में कारों और मोटरसाइकिलों की तादाद बेतहाशा बढ़ने का काफी योगदान है। भारत अपनी खपत का करीब तीन चौथाई कच्चा तेल आयात करता है। अगर तेल के आयात का खर्च बढ़ता है तो परिवहन और ढुलाई का खर्च बढ़ता है और इसका असर बहुत सारी चीजों की मूल्यवृद्धि के रूप में देखने में आता है। पेट्रोल की खपत कम करने और उसके विकल्पों का विकास करने की कोई गंभीर कोशिश इस पूरे दौर में नहीं हुई। निर्यात बढ़ाने के नाम पर भी कच्चे माल या मशीनों और कल-पुर्जों के आयात की खुली छूट दी गई। जरूरी वस्तुओं (जैसे खाद्य तेल) के आयात की भी बाढ़ आती गई और उनका उत्पादन भारत में बढ़ाने की कोशिश नहीं की गई। कुल मिला कर स्वावलंबन की नीति को छोड़ देने की गहरी कीमत आज भारत चुका रहा है।
इस पूरे दौर में विदेश व्यापार के घाटे और नतीजतन चालू खाते के बढ़ते घाटे के बारे में भारत सरकार बेपरवाह बनी रही, क्योंकि यह घाटा पूंजी खाते के अधिशेष से पूरा होता रहा। यानी सरकार इस घाटे की खाई को विदेशी कर्जे और विदेशी पूंजी से भरती रही। विदेशी कर्ज-पूंजी आने से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भरता गया, जिस पर भारत सरकार फूलती रही। अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह तक की सरकार इसे अपनी उपलब्धि बताती रही।
ये सरकारें और इनके साथ जुड़े अर्थशास्त्री एक साधारण-सी बात नहीं समझ पाए या उसे समझ कर भी नजरअंदाज करते रहे। वह यह कि पूंजी खाते में डॉलरों की आवक कोई हमारी कमाई नहीं है, वह तो उधार की आवक है। वह हमारी देनदारी बढ़ाती है। इस विदेशी पूंजी का प्रवाह कभी भी उलटा होकर हमारे लिए संकट पैदा कर सकता है। और वही आज हो रहा है।
ऋणम कृत्वा घृतम् पिबेत’ वाली इस नीति में दो चीजों पर निर्भरता खासतौर पर खतरनाक और जोखिम भरी थी- विदेशी पूंजी में पोर्टफोलियो निवेश और विदेशी कर्ज में अल्पकालीन कर्ज। पिछली सदी के अंतिम हिस्से में दक्षिण-पूर्व एशिया, मैक्सिको आदि कई देशों में इस उड़नछू पंूजी की कारस्तानियों के चलते आए संकट से भारत के नीति नियंताओं ने कोई सबक नहीं लिया और उसी आत्मघाती राह पर चलते रहे।
विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व व्यापार संगठन और अमेरिका द्वारा भारत जैसे देशों के कर्णधारों को वृद्धि या विकास की जो पट््टी पढ़ाई गई, उसमें दो महत्त्वपूर्ण मंत्र थे- निर्यात करो और विदेशी पूंजी को बुलाओ। पलक-पांवड़े बिछा कर भारत में जिस विदेशी पूंजी को बुलाया गया, उसमें करीब आधी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश या एफडीआइ के रूप में है तो आधी पोर्टफोलियो निवेश है।
यह दूसरी किस्म की पूंजी मूलत: परजीवी सट््टा-पूंजी है जो भारत के शेयर बाजार, ऋण बाजार या वायदा बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव से मुनाफे कमाना चाहती है। यह काफी चंचल है और कभी भी वापस जा सकती है। दस साल में आई पूंजी दस दिन में वापस जा सकती है। इसलिए वह अपनी गलत-सलत मांगें भी मनवाती रहती है और चाहे जब वापस जाने की धमकी देती रहती है। ‘मारीशस मार्ग’ से विशाल कर-चोरी, वोडाफोन कंपनी द्वारा 1100 करोड़ रुपए के कर-वंचन के मामले में समझौता करने की भारत सरकार की तैयारी और बजट में घोषित कर-वंचन रोकने के नियमों (गार) को 2015 तक टालने का फैसला इस बात के प्रमाण हैं कि विदेशी कंपनियों द्वारा कर-चोरी को भी सरकार बर्दाश्त कर रही है और उसकी इजाजत दे रही है।
भारत पर विदेशी कर्ज बढ़ रहा है और उसमें अल्पकालीन कर्जों का हिस्सा भी पिछले कुछ समय में तेजी से बढ़ा है। अल्पकालीन ऋण वे हैं जिनकी अवधि एक बरस या उससे कम रहती है। अगर इनका नवीनीकरण न हो, यानी इनके परिपक्व होने पर उनकी जगह नए ऋण न मिलें तो भी वे भुगतान संतुलन का नया संकट खड़ा कर देते है। भारत पर विदेशी कर्ज में अल्पकालीन ऋणों का हिस्सा 2002 में 2.8 फीसद था, जो अब बढ़ कर पच्चीस फीसद हो गया है। गौरतलब है कि 1991 के संकट के वक्त यह 10.2 फीसद था।
वित्तमंत्री और वित्त मंत्रालय के नौकरशाह कह रहे हैं कि चिंता की कोई बात नहीं है; भारत 1991 की तुलना में काफी बेहतर हालत में है। तब विदेशी मुद्रा भंडार तीन सप्ताह के आयात के बराबर रह गया था, लेकिन अभी घटने के बावजूद वह छह-सात महीने के बराबर है। विदेशी कर्ज भी तब हमारी राष्ट्रीय आय के 28.7 फीसद के बराबर था, अब बीस फीसद है।
लेकिन ऐसा भरोसा दिलाने के सिलसिले में वे अल्पकालीन कर्जों के बढ़ते अनुपात को छिपाने के साथ ही यह भी छिपा जाते हैं कि भारत विदेशी पोर्टफोलियो निवेश के जाल में पूरी तरह फंस चुका है। जबकि 1991 में इस नाम की कोई चिड़िया भी नहीं थी। अब विदेशी मुद्रा और विदेशी पूंजी के लेन-देन पर सरकार का नियंत्रण भी नहीं के बराबर रह गया है। इसलिए विदेशी मुद्रा का भंडार खाली होते देर नहीं लगेगी। वैश्वीकरण, उदारीकरण, विनियमन, विनियंत्रण और मुक्त व्यापार की नीतियों का नतीजा यह हुआ है कि दो दशक बीतते-बीतते हम जहां से चले थे वापस वहीं पहुंच रहे हैं। ऊंची वृद्धि दर की उपलब्धियां और वाहवाही सब काफूर हो चली है। यह साफ हो रहा है कि इन नीतियों से भारतीय अवाम का कोई भला नहीं हुआ, उलटे उसका जीवनयापन और मुश्किल हुआ है, भारत का शोषण भी बढ़ा है। साथ ही ये नीतियां जबर्दस्त अस्थिरता और संकट पैदा करने वाली भी हैं।
मगर इस बार संकट पहले से ज्यादा विकट और व्यापक होगा। कारण यह है कि जो भी और जैसा भी स्वावलंबन हमने आजादी के चार दशकों में हासिल किया था, उसे इन दो दशकों में योजनाबद्ध तरीके से खत्म किया गया है। अब हम दुनिया की वित्तीय पूंजी के खेल का मोहरा बन चुके हैं और हमारी निर्भरता काफी बढ़ चुकी है। मसलन, आज भारत में विदेशी ही नहीं, देशी कंपनियां भी बड़े पैमाने पर विदेशों से उधार लेकर काम कर रही हैं। रुपया सस्ता, डॉलर महंगा होने से उनकी देनदारी तेजी से बढ़ रही है। आयात महंगे होने से उनकी लागतें बढ़ रही हैं। अगर इन कंपनियों पर संकट आया तो उनमें भारी मात्रा में लगा भारतीय बैंकों का पैसा भी डूब सकता है। इसके गुणज असर की शृंखला कहां तक जाएगी इसकी कल्पना ही हमें सिहरा देने के लिए काफी है।
भारतीय अर्थव्यवस्था और भारत सरकार बुरी तरह एक दुश्चक्र में फंस चुकी हैं, और इससे बाहर निकलने का कोई आसान रास्ता नहीं है। रास्ता यही है कि हम विकास और अर्थनीति की अपनी दिशा और आर्थिक ढांचे को बदलें। गांधी, लोहिया, जेपी, कुमारप्पा और शूमाखर को याद न करना चाहें तो कम से कम जोसेफ स्टिगलिट्ज, ऊगो चावेज, इवो मोरालेस, किशन पटनायक और सच्चिदानंद सिंहा की बातों पर ही गौर फरमाएं। लेकिन दिल्ली की सत्ता के वातानुकूलित कमरों में बैठे महानुभावों में न तो इसका कोई सोच है और न ही इसकी हिम्मत या इच्छाशक्ति। वे तो आत्मघाती राह पर चल रहे हैं।

 

http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/20-2009-09-11-07-46-16/51004-2013-08-27-05-27-02


Related Articles

 

Write Comments

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Video Archives

Archives

share on Facebook
Twitter
RSS
Feedback
Read Later

Contact Form

Please enter security code
      Close